भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१३२ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— झुल रहा टेढ़ी भौंहोंमय, भौंर भ्रमित मुख उसका। रंगा हुआ है रिससे सत्त्वर, लाल कमल-सा जिसका ॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि सम्प्रति मुझे श्रीराधाके मुखपद्मका स्मरण हो रहा है। उनकी भौंहें क्रोधके कारण और अधिक कुटिल हो गयी होंगी। कोपके भारसे श्रीराधाका गोरा तथा लाल मुखड़ा कुटिल कान्तिवाली भौंहोंसे उसी प्रकार सुशोभित हो रहा है जैसे लाल कमलके ऊपर मँडराते हुए काले भ्रमरोंकी पंक्ति व्याप्त हो। प्रस्तुत श्लोकमें वाक्यार्थी उपमा अलङ्कार है, क्योंकि यहाँ रोषमय मुखकी उपमा लाल कमलसे तथा कुटिल काली भौंहोंकी समानता काले भ्रमरोंकी पंक्तिसे की गयी है ॥३॥ तामहं हृदि सङ्गतामनिशं भृशं रमयामि। किं वनेऽनुसरामि तामिह किं वृथा विलपामि— हरि हरि हतादरतया... ॥४॥ अन्वय—किम् (कथं) वने ताम् अनुसरामि (अन्वेषयामि) [न करकलितरत्नं मृग्यते नीरमध्ये इत्याभिप्राय:]; [तामुद्दिश्य] वृथा किं (कथं) विलपामि [एतद्विलपनं निष्फलमित्यर्थ:]; अहं हृदि सङ्गताम् (हृदयस्थां) [अपि] ताम् (राधाम्) अनिशं (निरन्तरं) भृशं (अत्यर्थं) रमयामि (तया सह विहरामि इत्यर्थ:) ॥४॥ अनुवाद—हाय! जब मैं सदासर्वदा श्रीराधाको अपने हृदय-मन्दिरमें प्रत्यक्ष अनुभव कर मन-ही-मन प्रगाढ़रूपसे आलिङ्गन करता हूँ, तब मैं उसके लिए क्यों वृथा ही विलाप कर रहा हूँ, क्यों उसको वन-वनमें ढूँढ़ता फिर रहा हूँ?