गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३३ पद्यानुवाद— राजित है वह सुन्दर प्रतिमा मन-मन्दिरमें मेरे, साँसें करती रहतीं जिसके फेरे साँझ-सबेरे। किस वनमें प्रिय जाऊँ, खोजूँ पदचिह्नोंको तेरे? कब तक रहूँ बरसता, आँखोंमें बदलीको घेरे? बालबोधिनी—विरहमें अतिशय व्याकुल अन्तर्मनमें श्रीराधाकी स्फूर्ति प्राप्त होनेपर श्रीकृष्ण कहते हैं, श्रीराधा तो अहर्निश मेरे मन-मन्दिरमें रहनेवाली मेरी प्रियतमा प्रेयसी हैं और अपनी हृदयस्थिता उन श्रीराधाके साथ मैं अत्यधिक रमण करता रहता हूँ। वे मुझसे कभी वियुक्त होतीं ही नहीं। वनमें जब है ही नहीं, तो उसमें उनको खोजनेसे क्या लाभ है और यहाँ देखकर मैं जो विलाप कर रहा हूँ वह भी व्यर्थ है॥४॥ तन्वि खिन्नमसूयया हृदयं तवाकलयामि। तन्न वेद्मि कुतो गतासि तेन तेऽनुनयामि— हरि हरि हतादरतया...॥५॥ अन्वय—हे तन्वि (कृशाङ्गि) तव हृदयं (चेतः) असूयया (तदुत्कर्षज्ञानारोद्यमरूपे गुणे दोषारोपणरूपया ईर्ष्या) खिन्नम् (नितरां व्यथितम्) आकलयामि (सम्भावयामि); तत् (तस्मात्) कुतः (कुत्र) गतासि इति न वेद्मि (न जानामि); तेन (हेतुना) ते (तुभ्यं) न अनुनयामि (पादग्रहणादिना न क्षमापयामि)॥५॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि ! प्रतीत होता है, तुम्हारा हृदय असूयासे कलुषित हो गया है, परन्तु मैं क्या करूँ, तुम अभिमानिनी होकर कहाँ चली गयी हो—पर मैं नहीं जानता हूँ कि तुम्हारे मानको दूर करनेके लिए कैसे अनुनय विनय करूँ ?