गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— जान रहा ईर्ष्यासे तन्वी! छिन्न हृदय है तेरा। कहाँ गयी है? सुन पायेगी क्या यह अनुनय मेरा? बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाकी वियोगावस्थासे अत्यन्त व्याकुल हैं, उद्विग्न हैं। वे अपने समक्ष ही विद्यमान-सी श्रीराधाको मानकर, स्फूर्त्तिके उद्गमित होनेपर श्रीराधाको ‘तन्वि’ पदसे सम्बोधित करने लगे—हे राधे! मैंने तुम्हें छोड़कर दूसरी ब्रजाङ्गनाओंके साथ विहार किया। इसलिए तुम्हारा हृदय कलुषित हो गया है, तुम्हारे हृदयमें अपनी उत्कर्षताके कारण दूसरोंके प्रति ईर्ष्या भर गयी है। दोषारोपणके कारण तुम्हारा हृदय खेदमय हो गया है। तुम यहाँसे अन्यत्र चली गयी हो। यदि मैं जानता कि तुम कहाँ गयी हो तो तुम्हारा पादस्पर्श करके तुम्हें मना लेता—तुमसे क्षमा माँग लेता॥५॥ दृश्यसे पुरतो गतागतमेव मे विदधासि। किं पुरेव ससंभ्रमं-परिरम्भणं न ददासि— हरि हरि हतादरतया... ॥६॥ अन्वय—[प्रिये,] मे (मम) पुरतः (अग्रतः) एव गतागतं (यातायातं) विदधासि (करोषि); [पुरतः] दृश्यसे [तथापि] किं (कथं) पुरा इव (पूर्ववत्) ससम्भ्रमं (सावेगं यथा स्यात् तथा) परिरम्भणं (आलिङ्गनं) न ददासि [पुरः स्थितायाः प्रियतमाया ईदृशी निष्ठुरता न युक्ता इत्यभिप्रायः] ॥६॥ अनुवाद—हाय! तुम मेरे सामने आती जाती सी दिखायी दे रही हो, पर पहलेकी भाँति अतिशय प्रेमोल्लासके कारण सम्भ्रमके साथ तुम सहसा ही मेरा आलिङ्गन क्यों नहीं करती हो? पद्यानुवाद— मेरे सम्मुख दीख रही तू, पल पल आती जाती। क्यों न सजनि! फिर सहज भावसे भुज युगमें बँध जाती॥