भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 448 में से

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तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३५ बालबोधिनी—हे प्रिये कृशाङ्गि! अपने सामने मैं तुमको यातायात करता हुआ देख रहा हूँ, बस केवल तुम आती जाती ही हो, पर क्या कारण है कि आज तुम मुझे आलिङ्गन पाशमें नहीं बाँध रही हो? तुम इतनी निष्ठुर क्यों बन गयी हो? सच है कि विरही पुरुषकी उद्विग्नावस्था जब पराकाष्ठापर पहुँच जाती है, तब उस समय उसकी भावना चरम अवस्थाको प्राप्त हो जाती है। उस समय उसे लगता है कि उसका प्रेमी वहीं है। श्रीराधाके वियोगके कारण श्रीकृष्ण इतने विकल हो गये हैं कि उनकी भावना साक्षात्कृतावस्था तक पहुँच गयी है, सभी ओर श्रीराधा ही श्रीराधा दिखायी दे रही है। वही, वही, बस वही श्रीराधा सम्पूर्ण संसारमें दिखायी दे रही है॥६॥ क्षम्यतामपरं कदापि तवेदृशं न करोमि। देहि सुन्दरि दर्शनं मम मन्मथेन दुनोमि— हरि हरि हतादरतया...॥७॥ अन्वय—हे सुन्दरि, क्षम्यतां [अपराधमिमम् इति शेषः] कदापि तव अपरम् ईदृशम् (एवम्प्रकारं) [अप्रियमिति शेषः] न करोमि (करिष्यामि); [अतः] मम दर्शनं देहि; मन्मथेन (मनो मथ्नातीति मन्मथो विरहः तेन) दुनोमि (क्लेशं प्राप्नोमि)॥७॥ अनुवाद—हे सुन्दरि! मुझे क्षमा कर दो। अब तुम्हारे सामने ऐसा अपराध कभी नहीं करूँगा। अब दर्शन दो, मैं कन्दर्प पीड़ासे व्यथित हो रहा हूँ। पद्यानुवाद— क्या न क्षमा अब कर दोगी निज अपराधीको रानी? मधुमयि! दर्शन दे कष्टोंकी कर दो अन्त कहानी॥ भूल न होगी; अब भविष्यमें यह आँखोंका पानी— साक्षी है, कवि ‘जय’ के स्वरमें गूँजी मोहन-वाणी॥

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