गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—श्रीकृष्णकी उद्वेगावस्थाकी चरम सीमा यहाँ कविद्वारा अभिव्यक्त हो रही है। मनमें श्रीराधाकी स्फूर्त्ति होने लगी है, उनके सामने वे अपने आराध्यकी स्वीकृति करते हुए कह रहे हैं, हे राधे! मेरे अपराधोंको क्षमा करो, जो कुछ हो गया उसे भूल जाओ, भविष्यमें अब कभी ऐसा अपराध नहीं करूँगा। मुझे दर्शन दो, मैं तुम्हारा अति प्रिय हूँ, तुम मेरी आँखोंसे ओझल मत होओ। तुम्हारे विरहमें मैं कामतापसे झुलसा जा रहा हूँ। प्रस्तुत गीतमें वर्णित नायक श्रीकृष्ण धीर ललित हैं तथा परस्पर अनुराग जनित विप्रलम्भ-शृङ्गार इस गीतका प्रधान रस है। वर्णितं जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन। केन्दुबिल्व-समुद्रसम्भव-रोहिणी-रमणेन— हरि हरि हतादरतया... ॥८॥ अन्वय—केन्दुबिल्व-समुद्र-सम्भव-रोहिणी-रमणेन (केन्दु- बिल्वनामा ग्रामः स एव समुद्रं तस्मात् सम्भवतीति तथोक्तः यः रोहिणीरमणः चन्द्रः तेन) जयदेवकेन प्रवणेन (प्रणतेन सता; नम्रेण इत्यर्थः) हरेः (कृष्णस्य) इदं (विरहगीतं) वर्णितं (रचितम्) ॥८॥ अनुवाद—केन्दुबिल्व नामक ग्रामरूप समुद्रसे जो चन्द्रमाकी भाँति आविर्भूत हुए हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णकी विलापसूचक वचनावलीका संग्रह किया है—ऐसे कवि श्रीजयदेव विनम्रताके साथ इस गीतका वर्णन कर रहे हैं। बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेवजीने अत्यन्त विनयपूर्वक श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णके विरह-विलापका वर्णन किया है। समुद्रसे जैसे चन्द्रमाका उद्भव होता है, उसी प्रकार केन्दुबिल्व गाँवमें जयदेव नामक कविका आविर्भाव हुआ है। श्रीजयदेव