गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १३७ कविका एक नाम पीयूषवर्षी है। पीयूषवर्षी चन्द्रमाका भी एक नाम है। रोहिणीरमण चन्द्रमाका ही नाम है। चन्द्रमासे जैसे सभी लोग आनन्दित होते हैं, उसीप्रकार इस गीतिकाव्यसे भी सभी लोग आनन्दित होंगे ॥८॥ हृदि विसलता-हारो नायं भुजङ्गम-नायकः कुवलय-दल-श्रेणी कण्ठे न सा गरल-द्युतिः मलयज-रजो नेदं भस्म-प्रिया-रहिते मयि प्रहर न हर-भ्रान्त्याऽनङ्ग क्रुधा किमु धावसि ? ॥९॥ अन्वय—[अधुना मन्मथमुपालभते]—हे अनङ्ग, क्रुधा (कोपेन) किमु (कथं) धावसि ? [मदर्थञ्चेत्, तर्हि] हरभ्रान्त्या (शङ्करभ्रमेण) प्रियारहिते मयि न प्रहर (प्रहारं मा कुरु) [हरस्तु प्रियार्द्धाङ्गयुक्तः अतो नाहं हरोऽस्मि; तल्लक्षणादिकं चेत् दृश्यते मयि इत्यपि न; तथाच हरभ्रान्तिं वारयति] हृदि (मम वक्षसि) अयं विसलताहारः (विसलताया मृणालस्य हारः); [विरहतापशान्त्यर्थं ध्रियते इति भावः] भुजङ्गम-नायकः (भुजगपतिः शेषः यः हरेण मालाकारेण हृदि ध्रियते इति सः) न। कण्ठे कुवलय- दलश्रेणी (कुवलयानां नीलोत्पलानां दलश्रेणी दलपङ्क्तिः), [शैत्याय ध्रियते इति भावः]; सा (प्रसिद्धा) गरलद्युतिः (हलाहलकान्ति; या हरकण्ठे विराजते सा) न। [किञ्च] इदं (मम गात्रलग्नं) मलयज-रजः (चन्दनरेणुः) विरहताप-शान्त्यर्थं शैत्याय सौगन्धाय ध्रियते इति भावः] भस्म (हरगात्रलग्नं भषितं) न ॥९॥ अनुवाद—हे अनङ्ग ! क्या तुम मुझे चन्द्रशेखर जानकर रोष भरकर कष्ट दे रहे हो ? तुम्हारी यह कैसी विषमता है ? मेरे हृदयमें जो कुछ देख रहे हो, वह भुजङ्गराज वासुकी नहीं है, यह तो मृणाल लता निर्मित हार है। कण्ठदेशमें विषकी नीलिमा नहीं है, नील कमलकी माला है। यह प्रियाविहीन मेरी इस देहपर चिताभस्म नहीं, यह तो चन्दनका