गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुलेपन है। इसलिए हे मन्मथ ! तुम निवृत्त हो जाओ, भ्रममें पड़कर मुझपर व्यर्थ ही विषम बाणकी वर्षा मत करो, क्रोध करके मेरी ओर क्यों दौड़ रहे हो ? और देखो ! महादेव पार्वतीके साथ अर्द्धाङ्गमें मिलित होकर सुखसे विराज रहे हैं, परन्तु मेरी प्राणाधिका राधिकाके साथ मिलन तो बहुत दूरकी बात, वह कहाँ है, मैं भी नहीं जानता हूँ॥९॥ पद्यानुवाद— उर पर नाग नहीं है यह तो, श्रेणी कुवलय दलकी। विषकी आभा नहीं कण्ठमें, माला नील कमल की॥ भस्म नहीं है शीतल करने, विरह तापकी ज्वाला— लगा रहा मलयज–रज तनमें, मैं विरही मतवाला॥ बालबोधिनी—प्रेयसी श्रीराधाके विरहमें कामदेवके बाणोंसे श्रीकृष्णका अन्तःकरण जर्जरित हो गया है। श्रीकृष्णको ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे कामदेवने उसे चन्द्रमौलि समझ लिया है, तभी तो अपने अभेद्य बाणोंका प्रहार उन पर कर रहा है, विह्वल होकर श्रीकृष्ण कहते हैं—हे अनङ्ग ! देखो, महादेव सर्वदा अपनी प्रियतमा पार्वतीके साथ अर्द्धाङ्गमें मिलित होकर कैसे सुखसे विराजमान हैं, परन्तु प्राणाधिका श्रीराधिकाके साथ मेरा मिलन तो बहुत दूरकी बात है, वह कहाँ है, यह भी मुझे पता नहीं है। मन्मथ-सन्तापसे पीड़ित श्रीकृष्णको श्रीराधाकी स्फूर्त्ति हो रही है। अतः वे साक्षात् रूपमें कह रहे हैं—हे अनङ्ग! तुम क्यों व्यर्थ ही क्रोध करके मुझे शङ्कर समझकर बार-बार मेरे ऊपर आघात करनेके लिए दौड़ रहे हो। तुम्हें जो यह साँपकी तरह कमलनालके सूतोंकी माला दिखती है, यह तो मृणाल-दण्डका हार है, मेरे गलेमें जो नील-कमलोंकी पंक्ति है, उसे तुम शङ्करके गलेमें विषकी नीलकान्ति मान रहे हो, मेरे शरीर पर जो यह देख रहे हो वह भस्म नहीं है, वह तो