गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० श्रीगीतगोविन्दम् तुम्हारा कौनसा पराक्रम सिद्ध होगा? तुम इस आम्रमञ्जरीके बाणको अपने हाथमें मत लो और यदि लेते भी हो तो उसे धनुषपर मत चढ़ाओ। देखो! उस मृगनयना श्रीराधाके ही प्रसृमर कटाक्षोंसे जर्जरित मेरा मन अभी तक स्वस्थ नहीं हो पाया है, अतएव मदनविकारसे मूर्च्छित उसपर प्रहार मत करो ॥१०॥ पद्यानुवाद— शिवके धोखे 'अशिव' कृत्य क्यों करते मनसिज भोले! रोष भरे बरसाते हो शर निशिदिन तरकस खोले। आम्रमञ्जरीके बाणोंको मत निज करमें धरना। यदि धरना तो धनुपर धरकर सन्धान न करना॥ देख रहे हो मृगनयनीके शरसे हियका छिदना। पुनः तुम्हारे बाणोंका क्या सह पाऊँगा बिधना॥ निज क्रीड़ासे जीत विश्वको उस पर शासन करते। मूर्च्छित जनपर कर प्रहार क्यों शौर्य प्रदर्शन करते? बालबोधिनी—कामदेवने मानो श्रीकृष्णसे कहा-मेरे शरीरको जलानेवाला वह शिव तो शत्रु है ही, परन्तु आप भी मेरे शासनका उल्लंघन करनेवाले हैं, अतः आप पर भी बाणोंका अनुसन्धान करूँगा। तब श्रीकृष्ण कामको उपालम्भ देते हुए कहते हैं कि—हे मनसिज! मत लो हाथमें आमके बौरोंका बाण। कामदेवके पुष्पबाण पाँच प्रकारके होते हैं— (१) आम्र मुकुल, (२) अशोक पुष्प, (३) मल्लिका पुष्प, (४) माधवी पुष्प, (५) बकुल पुष्प (मौलश्री)। वसन्त ऋतु होनेके कारण आम्रमञ्जरी वृक्षोंके अग्रभागमें निकल आयी है। श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं कि कामदेव इसी आम्रमञ्जरीको अपना बाण बनाकर राधा-विरहमें व्यथित मुझपर ही आघात करेगा। अतएव उसे विरमित कर रहे हैं—तुम आम्रमञ्जरीके उस बाणको अपने करोंमें ग्रहण मत करो।