भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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तृतीयः सर्गः-मुग्ध-मधुसूदनः १४१ मा चापमारोपय—यदि तुमने निज हाथोंमें धारण कर ही लिया है, तो भी इसे अपने धनुषकी प्रत्यंचापर मत चढ़ाओ। हे क्रीडानिर्जित विश्व—अपने खेलसे ही विश्वको जीतनेवाले! मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ, वह बाण मुझ निष्प्राणका वध कर डालेगा। तुम विश्वविजयी हो, मैं श्रीराधाके वियोगके कारण मृततुल्य हूँ। तुम्हारे जैसा वीर किसी मरेको मारने लगे, तो तुम्हारा ही अपयश होगा, तुम्हारे पराक्रमकी प्रशंसा न होगी। 'मनसिज' इस पदसे श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि तुम तो मेरे मनसे ही उत्पन्न हुए हो। जिससे उत्पन्न हुए हो, उसीको मारने लग जाना तो कोई उचित कार्य नहीं है। तुम श्रीराधाके लिए मेरे प्रति बाणोंका प्रहार करना चाहते हो तो श्रीराधाके प्रसृमर कटाक्षपातरूपी बाण जो तुम्हारे बाणोंसे भी अधिक तीक्ष्ण है, उसीसे जर्जरित हो गया हूँ। इस घायल पर असाध्य विषबाणका प्रहार क्यों? प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीडित छन्द तथा आक्षेपालङ्कार है॥१०॥ भ्रूपल्लवो धनुरपाङ्ग-तरङ्गितानि बाणा गुणः श्रवण-पालिरिति स्मरेण। तस्यामनङ्ग-जय-जङ्गम-देवताया- मस्त्राणि निर्जित-जगन्ति किमर्पितानि ॥११॥ अन्वय—भ्रूपल्लवः (भ्रूः पल्लव इव तथोक्तः) धनुः (कार्मुकं) अपाङ्गतरङ्गितानि (कटाक्षप्रेक्षितानि) बाणाः (शराः), श्रवणपालिः (कर्णप्रान्तभागः) गुणः (मौर्वी) इति (एतानि) निर्जित-जगन्ति (निर्जितानि जगन्ति यैः तादृशानि) अस्त्राणि स्मरेण (कामेन) अनङ्ग-जय-जङ्गम-देवतायाम् (अनङ्गस्य जयः त्रिभुवनपराभव स्तस्य या जङ्गमा चञ्चला देवता तदधिष्ठात्री देवीत्यर्थः तथाभूतायां) तस्याम् (राधायाम्) अर्पितानि