गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ श्रीगीतगोविन्दम् (न्यस्तानि) किम्? [तत्प्रसादलब्धैरस्त्रैः जगज्जित्वा पुनस्तत्रै- वार्पितानीति भावः] ॥३॥ अनुवाद—अहो! भ्रु-पल्लवरूपी धनुष, अपाङ्ग-भङ्गिमा, तरङ्गरूपी बाण, नयन अवधि श्रवण प्रान्ततक विस्तृत ज्या अर्थात् धनुषकी डोरी—इस सम्पूर्ण अमोघ अस्त्रविद्याके साधनरूपी उपकरणोंको कामदेवने सम्पूर्ण जगतको निर्विशेषरूपमें जीतकर उन अस्त्रोंकी स्वामिनी, अपनी विजयकी जङ्गम देवता श्रीराधाको पुनः अर्पित कर दिया है। पद्यानुवाद— त्रिभुवन विजयी अस्त्रोंको, अर्पित राधाको ऐसे- कर समा गया स्मर उसमें, कोई हारा हो जैसे। भौंहोंमें 'धनुष' बसा है, शर-पाँत दीठमें बैठी! कानोंकी पाली दिखती, मानो प्रत्यंचा ऐंठी॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधामें कामबाण-समूहका आरोपण करते हुए कहते हैं कि संसारको जीतनेवाले अस्त्रोंको कामदेव श्रीराधामें ही निक्षिप्त कर दिया है क्या? 'तत्' शब्दसे यहाँ 'पूर्वानुभूति' अभिव्यक्त हुई है। 'तस्याम्' पदसे सूचित किया है कि जिस श्रीराधाके वियोगसे मैं व्याकुल हूँ, जो मेरी मनःकान्ता है, उसीमें श्रीकृष्णने जगद्विजयी अस्त्रोंको निक्षिप्त कर दिया है। श्रीराधाके द्वितीय वैशिष्ट्यका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि श्रीराधा अनङ्गजयी जङ्गम देवता है। कामदेव तो जगद्विजय करनेवाले चलते-फिरते देवता हैं। श्रीराधासे ही अस्त्रोंको उपलब्ध करके कामदेवने जगत् जीता और पुनः उद्देश्यकी पूर्ति हो जानेपर उसी देवताको उन अस्त्रोंको समर्पित कर दिया है। कामदेवका जगद्विजयी अस्त्र है—भ्रूपल्लव-धनुः। श्रीराधाकी भौंहें नीली एवं स्निग्ध हैं; इसलिए उनमें भ्रूपल्लवका आरोप है और टेढ़ी होनेसे उनमें धनुषका आरोप है। श्रीराधाके