गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—एकान्तमें प्रियाका ध्यान करते हुए मैं इसके उसी सुविमल स्पर्शजनित सुखका अनुभव कर पुलकित हो रहा हूँ, उसके नयनयुगलकी चञ्चलता, सुस्निग्ध भङ्गिमा, विभ्रमता और दृष्टिक्षेपता मुझे संजीवित कर रही है, उसके मुखारविन्दका सौरभ मुझे आप्लावित कर रहा है, उसकी उस अमृत निस्यन्दी वचन-परम्पराकी वक्रिमाको श्रवण कर रहा हूँ। उसके बिम्बफल सदृश मनोहर अधरका मधुर सुधारसका मैं आस्वादन कर रहा हूँ। उसमें समाधिस्थ मेरे मनकी विषयासक्ति बनी हुई है, फिर भी मुझमें विरह व्याधिकी यातना अधिकाधिकरूपमें क्यों बढ़ती जा रही है? पद्यानुवाद— वे स्पर्शजनित सुख कोमल, चल दृष्टिक्षेप रस भीने वह वदन कमल मधु सौरभ, वे वचन सुधा मधुलीने। वे मधुर अधर बिम्बा सम, तन्मय करते यों मनको जैसे समाधिमें योगी, विस्मृत कर देते तनको। संलग्न ध्यान सखि! तुझमें पर विरह व्यथा यह मेरी भूली है लेश न मुझको, घेरे हैं बनी अहेरी॥१३॥ बालबोधिनी—भावनाकी प्रबलतासे श्रीराधाके साथ विलासकी स्फूर्त्ति होनेपर अन्तःकरणमें बहती हुई विरह-व्याधिकी प्रतिकूलताका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं—श्रीराधामें मेरा मन समाधिस्थ हो गया है, तथापि विरह क्यों मुझे सता रहा है, क्योंकि विरह तो वहाँ होता है जहाँ खेद एवं वियोग होता है, जबकि मेरा मन तो श्रीराधामें संलग्न है। मनः संयोगके अभावमें विरह माना जा सकता है, परन्तु मन तो यहाँ संयुक्त है, फिर भी विरह इसलिए है कि इन्द्रिय संयोगका अभाव है। अतःपर यह भी कहा गया है कि विषयोंके न रहने पर भी मन-ही-मन इन्द्रियसुखका अनुभव होनेसे उसे संयोग कहा जा सकता है, परन्तु विरह बना हुआ होता है।