गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथार्थ क्या है? मिलनमें जो अनुभव होता था, वही अनुभव विरहमें भी हो रहा है। त्वचासे श्रीराधाके स्पर्शजनित पूर्वानुभूत सुखको ही अनुभव कर रहा हूँ, चक्षुसे उसके प्रेमाद्रनेत्रोंकी तरल प्रीति रसधारको देख रहा हूँ, नासिकासे श्रीराधिकाके मुखकमलके पूर्वानुभूत सौगन्धका आघ्राण कर रहा हूँ। समाधिमें प्रत्यक्षमाणा श्रीराधाकी वाणीकी अमृत-स्राविणी वक्रिमाका श्रवणास्वादन कर रहा हूँ, तथैव बिम्बफल सदृश अरुणिम सुकुमार अधराधरकी मधुर सुधारस माधुरीमें अवगाहन कर रहा हूँ। इसप्रकार पाँचों प्रकारके विषयोंका सम्बन्ध मेरे साथ बना हुआ है। तथापि न जाने क्यों विरहजनित समाधि बढ़ती जा रही है? प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है, समुच्चयालङ्कार तथा विप्रलम्भ शृङ्गार है ॥१३॥
तिर्यक्-कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंसस्य वंशोच्चरद् गीति-स्थान-कृतावधान ललना-लक्षै र्न संलक्षिताः। सम्मुग्धं मधुसूदनस्य मधुरे राधामुखेन्दौ सुधा- सारे कन्दलिताश्चिरं ददतु वः क्षेमं कटाक्षोर्म्मयः ॥१४॥ अन्वय-[अधुना आशिषा सर्गं समापयति]-तिर्यक्- कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंसस्य (तिर्यक् ईषद्वक्रः कण्ठः यस्य सः विलोलः चञ्चलः मौलिः मस्तकं तत्रत्य चूड़ा वा यस्य तथाभूतः तथा तरलो चञ्चलौ उत्तंसौ कुर्णकुण्डलौ यस्य सः; विशेषण-समासः तादृशस्य) मधुसूदनस्य मधुरे (मनोहरे) राधामुखेन्दौ (राधायाः मुखम् इन्दुरिव तस्मिन्) मृदुस्पन्दम् (ईषच्चञ्चलं यथास्यात् तथा) कन्दलिताः (पल्लविताः, अन्यगोपाङ्गनावदनोडुगणमपहारा तत्रैव उल्लसिताः (वंशोच्चरद्- गीति-स्थान-कृतावधान-ललनालक्षैः (वंशात् वेणुतः उच्चरत् या गीतिः तस्याः स्थानेषु पदेषु कृतम् अवधानं यैः तादृशैः