गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ श्रीगीतगोविन्दम् ललनानां गोपसुन्दरीणां लक्षैः) न संलक्षिताः (अविज्ञाता इत्यर्थः) कटाक्षोर्म्मयः (कटाक्षाणाम् ऊर्म्मयः तरङ्गाः अपाङ्गदर्शन- श्रेणीत्यर्थः) वः (युष्माकं) चिरं क्षेमं दधतु। [अतएव मुग्धमधुसूदनो रसविशेषास्वाद-चतुरस्ततो मुग्धो मधुसूदनो यत्र इत्ययं सर्गस्तृतीयः] ॥१४॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये मुग्ध-मधुसूदनो नाम तृतीयः सर्गः। अनुवाद—त्रिभङ्ग भावसे अपनी ग्रीवाको बङ्किम करनेके कारण जिनका शिरोभूषण (मुकुट) एवं कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, लक्ष-लक्ष गोप-रमणियाँ वेणु-ध्वनिके सुदीप्त उच्चारण स्थानपर ध्यान लगायी हुई उनके मध्यमें स्थित श्रीराधाके मनोहर तथा अमृतमय मुखारविन्दको स्नेहातिशयताके कारण स्थिरदृष्टिसे देखते हुए श्रीकृष्णकी कटाक्षपात राशिकी ऊर्मियाँ आप सबका मङ्गल विधान करें॥ बालबोधिनी—तृतीय सर्गके अन्तिम श्लोकमें कविने श्रीराधाके वचनोंको प्रमाणित किया है। गोपाङ्गनाओंके मध्यमें अवस्थित श्रीकृष्णको श्रीराधा-दर्शनसे भावानुभूति हुई है, उसीको यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। कविने पाठकों एवं श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान किया है कि मुग्ध-मधुसूदन आपका कल्याण विधान करें। मधुसूदन—जो श्रीराधाके मुखकमलकी ईषत् चञ्चलता एवं संमुग्धताका दर्शनकर अतिशय उल्लसित हुए हैं, सम्पूर्ण इतर कामनाओंका परित्याग कर श्रीराधामें एकनिष्ठ हुए हैं—उनके कटाक्षपातकी उर्मियाँ स्नेहातिशयताके कारण श्रीराधाके सुललित एवं मधुमय मुखचन्द्रपर स्थिर हो गयी हैं। संमुग्ध—पदसे श्रीराधाके मुखकी मनोज्ञ अतिशयता बतायी गयी है। 'मधुर' पदसे श्रीराधाके मुखको अमृतसे भी मधुर बताया गया है। मोहकता एवं माधुर्यके कारण श्रीराधाके मुखको श्रीकृष्ण बड़े चावसे देखते हैं। 'सुधासार'