भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १४९ से भी श्रीराधाके मुखका पीयूषत्व अभिव्यक्त हो रहा है। श्रीकृष्णको आह्लादित करनेके कारण श्रीराधामें विधुत्वका आरोप किया गया है। स्थिर दृष्टिसे श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुखको देख रहे थे, परन्तु श्रीकृष्णकी इस क्रियाको वहाँ अवस्थित गोपियाँ देख न सकीं। गोपियोंसे आवृत श्रीकृष्ण बाँसुरीके दीप्तस्थानसे स्वरालाप कर रहे थे, सभीका ध्यान उन सुरोंमें ही लगा हुआ था। सभी श्रवणजनित आनन्दमें मग्न थीं। वंशीध्वनिसे सभीके चित्तको आकर्षित करनेके साथ श्रीकृष्णने अपनी वंशीकी तानसे श्रीराधाको भी मोहित कर लिया, जिसका अनुभव किसी गोपीको भी न हो सका—इससे श्रीकृष्णका चातुर्य प्रकाशित होता है। श्रीकृष्णकी मुखमुद्राका वर्णन करते हुए कवि कहते हैं—'तिर्यक्-कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंस्य' अर्थात् श्रीकृष्णकी ग्रीवाको तिरछे किये हुए बङ्किम मुद्राके कारण उनके मुकुट तथा कर्णाभरण चञ्चल हो रहे थे। 'मौलि' पदसे मुकुट और शिर दोनों वाच्य हैं, तथापि शिरका हिलना वेणुवादकका दोष है और न हिलना दक्षता। श्रीकृष्णमें अद्भुत नैपुण्य था, अतः शिर नहीं हिल रहा था। मुकुट और कर्णाभूषण ही आन्दोलित हो रहे थे। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा रूपकालङ्कार है। इस प्रकार गीत गोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मधुसूदन नामक तृतीय सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या पूर्ण हुई।