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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

१४८ श्रीगीतगोविन्दम् ललनानां गोपसुन्दरीणां लक्षैः) न संलक्षिताः (अविज्ञाता इत्यर्थः) कटाक्षोर्म्मयः (कटाक्षाणाम् ऊर्म्मयः तरङ्गाः अपाङ्गदर्शन- श्रेणीत्यर्थः) वः (युष्माकं) चिरं क्षेमं दधतु। [अतएव मुग्धमधुसूदनो रसविशेषास्वाद-चतुरस्ततो मुग्धो मधुसूदनो यत्र इत्ययं सर्गस्तृतीयः] ॥१४॥ इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये मुग्ध-मधुसूदनो नाम तृतीयः सर्गः। अनुवाद—त्रिभङ्ग भावसे अपनी ग्रीवाको बङ्किम करनेके कारण जिनका शिरोभूषण (मुकुट) एवं कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, लक्ष-लक्ष गोप-रमणियाँ वेणु-ध्वनिके सुदीप्त उच्चारण स्थानपर ध्यान लगायी हुई उनके मध्यमें स्थित श्रीराधाके मनोहर तथा अमृतमय मुखारविन्दको स्नेहातिशयताके कारण स्थिरदृष्टिसे देखते हुए श्रीकृष्णकी कटाक्षपात राशिकी ऊर्मियाँ आप सबका मङ्गल विधान करें॥ बालबोधिनी—तृतीय सर्गके अन्तिम श्लोकमें कविने श्रीराधाके वचनोंको प्रमाणित किया है। गोपाङ्गनाओंके मध्यमें अवस्थित श्रीकृष्णको श्रीराधा-दर्शनसे भावानुभूति हुई है, उसीको यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। कविने पाठकों एवं श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान किया है कि मुग्ध-मधुसूदन आपका कल्याण विधान करें। मधुसूदन—जो श्रीराधाके मुखकमलकी ईषत् चञ्चलता एवं संमुग्धताका दर्शनकर अतिशय उल्लसित हुए हैं, सम्पूर्ण इतर कामनाओंका परित्याग कर श्रीराधामें एकनिष्ठ हुए हैं—उनके कटाक्षपातकी उर्मियाँ स्नेहातिशयताके कारण श्रीराधाके सुललित एवं मधुमय मुखचन्द्रपर स्थिर हो गयी हैं। संमुग्ध—पदसे श्रीराधाके मुखकी मनोज्ञ अतिशयता बतायी गयी है। 'मधुर' पदसे श्रीराधाके मुखको अमृतसे भी मधुर बताया गया है। मोहकता एवं माधुर्यके कारण श्रीराधाके मुखको श्रीकृष्ण बड़े चावसे देखते हैं। 'सुधासार'

तृतीयः सर्गः—मुग्ध-मधुसूदनः १४९ से भी श्रीराधाके मुखका पीयूषत्व अभिव्यक्त हो रहा है। श्रीकृष्णको आह्लादित करनेके कारण श्रीराधामें विधुत्वका आरोप किया गया है। स्थिर दृष्टिसे श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुखको देख रहे थे, परन्तु श्रीकृष्णकी इस क्रियाको वहाँ अवस्थित गोपियाँ देख न सकीं। गोपियोंसे आवृत श्रीकृष्ण बाँसुरीके दीप्तस्थानसे स्वरालाप कर रहे थे, सभीका ध्यान उन सुरोंमें ही लगा हुआ था। सभी श्रवणजनित आनन्दमें मग्न थीं। वंशीध्वनिसे सभीके चित्तको आकर्षित करनेके साथ श्रीकृष्णने अपनी वंशीकी तानसे श्रीराधाको भी मोहित कर लिया, जिसका अनुभव किसी गोपीको भी न हो सका—इससे श्रीकृष्णका चातुर्य प्रकाशित होता है। श्रीकृष्णकी मुखमुद्राका वर्णन करते हुए कवि कहते हैं—'तिर्यक्-कण्ठ-विलोल-मौलि-तरलोत्तंस्य' अर्थात् श्रीकृष्णकी ग्रीवाको तिरछे किये हुए बङ्किम मुद्राके कारण उनके मुकुट तथा कर्णाभरण चञ्चल हो रहे थे। 'मौलि' पदसे मुकुट और शिर दोनों वाच्य हैं, तथापि शिरका हिलना वेणुवादकका दोष है और न हिलना दक्षता। श्रीकृष्णमें अद्भुत नैपुण्य था, अतः शिर नहीं हिल रहा था। मुकुट और कर्णाभूषण ही आन्दोलित हो रहे थे। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द तथा रूपकालङ्कार है। इस प्रकार गीत गोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मधुसूदन नामक तृतीय सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या पूर्ण हुई।

“और सखीकी व्यथा-कथा सब धीरे-धीरे बोली।”

चतुर्थः सर्गः स्निग्ध-मधुसूदनः यमुना-तीर-वानीर-निकुञ्जे मन्दमास्थितम्। प्राह-प्रेम-भरोद्भ्रान्तं माधवं राधिका-सखी ॥१॥ अन्वय—[अथ राधिकाविरहोत्कण्ठं श्रीकृष्णं] राधिकासखी (राधिकायाः काचित् सहचरी) प्रेमभरोद्भ्रान्तं (प्रेम्णां भरेण उद्भ्रान्तम् उन्मत्तं) [अतएव तदन्वेषणं विहाय] यमुनातीर-वानीर- निकुञ्जे (यमुनातीरे यत् वानीरनिकुञ्जं वेतसलता-कुञ्जं तस्मिन्) मन्दं (विषण्णं निरुद्यमं वा यथास्यात् तथा) आस्थितम् (उपविष्टं) माधवं प्राह (उवाच) ॥१॥ अनुवाद—यमुनाके तटपर स्थित वेतसीके निकुञ्जमें श्रीराधाप्रेममें विमुग्ध होकर विषण्ण (विषाद) चित्तसे बैठे हुए श्रीकृष्णसे श्रीराधाकी प्रिय सखी कहने लगी। पद्यानुवाद— यमुनातीरे वेतसकुञ्जे, बैठे हैं यदुवंशी राधाके चिन्तनमें अपनी भूले लकुटी-वंशी। इसी समय सम्मुख हो कोई छाया-सी आ डोली और सखीकी व्यथा-कथा सब धीरे-धीरे बोली॥ बालबोधिनी—अब दोनोंकी पृथक् कामावस्थाका निरूपण करके उन दोनोंका संयोजन करानेकी इच्छासे दूतीयोगका निरूपण करते हैं। श्रीराधिकाकी सखीने माधवसे कहा। पूर्वरागमें श्रीराधाने अपनी सखीसे श्रीकृष्ण-मिलनकी वासना अभिव्यक्त की थी। तब वह सखी श्रीराधाको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके पास गयी तो देखा, उनका चित्त श्रीराधा-विषयक प्रेमाधिक्यके कारण उद्भ्रान्त अर्थात्

१५२ श्रीगीतगोविन्दम् उन्मत्त-उद्विग्न हो रहा था। अन्वेषण करने पर भी जब उनकी श्रीराधा नहीं मिलीं तो वे यमुना पुलिन पर विद्यमान वेतसी निकुञ्जमें निरुत्साहित और उदास होकर बैठ गये। गीतम् ८ कर्णाटरागैकतालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह आठवाँ प्रबन्ध कर्णाटराग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। जब शिखिकण्ठ—नीलकण्ठ महादेव एक हाथमें कृपाण और दूसरे हाथमें एक विशाल गजदन्त धारणकर दाहिने कन्धेमें रखकर चलते हैं, सुर-चारण आदि उनकी स्तुति करते हैं, ऐसे समयमें कर्णाट राग प्रस्तुत होता है। निन्दति चन्दनमिन्दु-किरणमनुविन्दति खेदमधीरम्। व्याल-निलय-मिलनेन गरलमिव कलयति मलय-समीरम् ॥ सा विरहे तव दीना। माधव मनसिज-विशिख-भयादिव भावनया त्वयि लीना ॥१॥ ध्रुवपदम् अन्वय—हे माधव, तव विरहे दीना (कातरा) सा (राधा) मनसिजविशिखभयादिव (मनसिजस्य कामस्य विशिखेभ्यः बाणेभ्यः भयादिव) भावनया (उद्वेगेन) त्वयि लीना (ध्यानेन लयप्राप्ता) [इव आस्ते इति शेषः, कामरूपे त्वयि प्रसन्ने तद्भयं न करिष्यतीत्यभिप्रायः]; [सा अधुना] चन्दनम् इन्दुकिरणं (चन्द्रमयुखं) निन्दति, [स्वभावशीतलो यन्मां दहतः तन्ममैव दुर्दैवमिति] अनु (पश्चात्) अधीरं [यथा तथा] खेदं (तापं) विन्दति (लभते); [तथा] मलय-समीरं व्याल निलयमिलनेन (व्यालानां सर्पाणां निलयः चन्दनतरुः तस्य मिलनेन) गरलमिव कलयति (सम्भावयति) [सर्पभुक्तोज्झितो वायुः विषमिलितत्वात् विषवत् उत्प्रेक्षते] ॥१ ॥

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५३ अनुवाद—हे माधव ! वह श्रीराधा आपके विरहमें कातर होकर मदन-बाणके वर्षणके भयसे भीत होकर उस मन्द-सन्तापकी शान्तिके लिए ध्यान-योगके द्वारा आपमें निमग्न होकर आपके शरणागत हुई हैं। आपसे विच्युत होकर वह चन्दनको विनिन्दित करती हैं, चन्द्र-किरणोंको देखकर उनकी देह दग्ध होने लगती है, मलय-समीरण भी उसके अङ्गोंमें सन्ताप बढ़ा रहा है। विषधर सर्पोंसे परिवेष्टित चन्दन वृक्षोंसे प्रवाहित फुत्कार-मिश्रित होनेके कारण मलय-समीरको भी गरल समान मान रही हैं। पद्यानुवाद— वह विरह विदग्धा दीना माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना। वह विरह विदग्धा दीना चन्दन और चन्द्र-किरणोंसे होती अधिक अधीर, अहिगण गरल समान विमूर्च्छित करना मलय समीर। वह विरह विदग्धा दीना माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना। बालबोधिनी—सखी श्रीकृष्णके सन्निकट उनकी विरहवेदना सुनाती है। वह कहती है कि श्रीराधा अत्यन्त दुःखित हैं। कामबाणके त्राससे आपका ध्यान करती हुई आप ही में समाधिस्थ हो गयी हैं। बाणके भयसे जैसे प्राणी रक्षार्थ दूसरेकी शरणमें चला जाता है, उसी प्रकार वह आपके शरणापन्न हुई हैं; क्योंकि आप कामस्वरूप हैं, आपके प्रसन्न होनेपर किसीका भय नहीं रहता है। हे माधव ! आपके विरहमें श्रीराधाकी ऐसी स्थिति हो गई है कि अपने शरीरमें लगे हुए चन्दनकी निन्दा करती हैं, क्योंकि यह चन्दन उनके लिए आह्लादकारी नहीं अपितु प्रदाह रूप है। चन्द्र-किरणोंको देखकर भी उनका हृदय प्रज्वलित होने लगता है; क्योंकि चन्द्रिका भी उनकी कामाग्निको उद्दीपित कर रही है। चन्दन

१५४ श्रीगीतगोविन्दम् वृक्षके सम्पर्कसे मलय-पवनको भी वह गरलवत् अनुभव करती हैं। मलयाचलके चन्दनवृक्षोंसे लिपटे हुए विषैले सर्पोंकी फुत्कारोंसे वायु दूषित हो गयी है। ‘मनसिज-विशिख-भयादिव’ में उत्प्रेक्षा अलङ्कारका सौष्ठव है, साथ ही इस श्लोकमें रूपक और विरोधादलङ्कारोंकी भी संसृष्टि है। अविरल-निपतित-मदन-शरादिव भवदवनाय विशालम्। स्वहृदय-मर्माणि वर्म करोति सजल-नलिनी-दल-जलम्॥ सा विरहे तव दीना...॥२॥ अन्वय-[किञ्च अतिस्निग्धायां तस्यां कथमिव त्वमेवं निष्ठुरो-ऽसीत्याह] - अविरल-निपतित-मदन-शरादिव (अविरलं निरन्तरं निपतितं) (पतनं, भावोक्त) यस्य तादृशस्य मदनस्य यः शरः तस्मादिव) भवदवनाय (भवतः हृदयस्थस्येति भावः अवनाय रक्षणाय) [तस्या हृदये भवान् तिष्ठति, हृदयञ्च कामो विध्यति, हृदयवेधनाद्भवतोऽपि वेधः स्यादित्याशङ्क्य भवद्रक्षणार्थमेवेति भावः] स्वहृदय-मर्म्मणि (निजहृदयरूपे मर्मस्थाने) विशालं (पृथुलं) सजल-नलिनी-दल-जालं (सजलनलिनीदलानां जालं समूहमेव) वर्म्म (कवचं) करोति॥२॥ अनुवाद-हृदय पर अनवरत गिरते हुए कामबाणोंसे अपने हृदयके भीतर विराजमान आपकी रक्षा करनेके लिए श्रीराधा विशाल सजल कमल-पत्र-समूहको अपने हृदयके मर्मस्थलका कवच बना रही हैं। पद्यानुवाद- मदन शरोंसे अपने प्रियकी रक्षामें बेहाल। उर पर बिछा रही है रह रह सजल कमलिनी-जाल॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५५ बालबोधिनी—श्रीकृष्णका निरन्तर ध्यान करनेसे श्रीराधा एकात्मकताको प्राप्त हो गयीं। यही सूचित करती हुई सखी कहती है—हे माधव ! आप श्रीराधाके हृदयमें निरन्तर विद्यमान हैं। कामदेव अपने बाणोंको अजस्र रूपसे छोड़ रहा है। आपको कहीं कष्ट न हो जाये, इसलिए अपने हृदयके मर्मस्थलको जलकणोंके साथ बड़े-बड़े कमलदल-समूहसे आवृत कर रही हैं। वह आपकी रक्षाके लिए सारे उपायोंको कर रही हैं। उत्प्रेक्षा करते हुए कहती हैं कि नलिनदल-जालको उसने हृदयमें इसलिए आच्छादित किया है कि उसके हृदयसे आप कहीं निकल न जायें। कामदेवका तूणीर (तरकश) अक्षय है—एकके बाद दूसरा बाण फेंका जा रहा है। हे माधव ! तुम्हारे विरहमें वह निरुपाय होकर उपाय भी सोचती है तो क्या सोचती है? कमल-दल तो वैसे ही उसके बाण हैं और वह कवच कहाँसे होगा? उसे अपना कवच बनाकर अपना कष्ट और बढ़ा रही हैं॥२॥ कुसुम-विशिख-शर-तल्पमनल्प-विलास-कला-कमनीयम्। व्रतमिव तव परिरम्भ-सुखाय करोति कुसुम-शयनीयम् ॥ सा विरहे तव दीना... ॥३॥ अन्वय—[अपि च] अनल्प-विलासकला-कमनीयं (अनल्पाभिः बहुभिः विलास-कलाभिः विलासभावैः कमनीयं मनोज्ञं) कुसुम-शयनीयं (पुष्पशय्यां) [अपि] [तव विरहे] कुसुमविशिख- शरतल्पम् (कुसुम-विशिखस्य कामस्य शरतल्पं शरशय्याभूतं) तव परिरम्भसुखाय (गाढालिङ्गनसुख-लाभाय) व्रतमिव करोति [सुदुर्लभं तव परिरम्भणसुखम्, अतस्तल्लाभाय व्रतचर्यामिव करोतीत्यर्थः] ॥३॥

१५६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे माधव ! विविध विलासोंसे रमणीय कुसुम-शय्या श्रीराधाके द्वारा रचायी जा रही है, जो कामदेवके बाणोंकी शय्याके समान प्रतीत हो रही है। आपके गाढ़ आलिङ्गनकी प्राप्तिकी आशासे वह कठोर-शरशय्याव्रतके अनुष्ठानका पालन कर रही है। बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! महान केलि-कला-विलासरूप पुष्प-शय्याकी रचना आपके विरहमें विदग्ध होकर श्रीराधा करती तो हैं, पर वह सेज काम-शरोंकी सेज सदृश ही है। उत्प्रेक्षा करते हुए सखी कहती है—जैसे कोई व्यक्ति किसी बड़े सुखकी प्राप्तिके लिए कोई व्रत करता है, उसी प्रकार श्रीराधा भी दुष्प्राप्य आपके आलिङ्गन-सुखकी प्राप्तिके लिए दुष्कर शरशय्या-व्रतकी साधना कर रही है। वहति च चलित-विलोचन-जलभरमानन-कमलमुदारम्। विधुमिव विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन-गलितामृतधारम्॥ सा विरहे तव दीना... ॥४॥ अन्वय—[किञ्च] वलित-विलोचन-जलधरं (वलितानि अविरतं गलितानि विलोचनयोः नेत्रयोः जलानि धारयतीति तथोक्तम्) उदारम् (विकस्वरम्) आननकमलं (मुखपद्मं) विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन गलितामृतधारं (विकटस्य करालस्य विधुन्तुदस्य राहोः दन्तदलनेन चर्वणेन गलिता अमृतधारा यस्मात् तं) विधुम् (चन्द्रम्) इव बहति (रोदितीति भावः; तेन च वदनमस्याः निष्पीडितसुधासारं सुधाकरमिव सम्भावयामि) ॥४॥ अनुवाद—जैसे कराल राहुके दशनसे संदशित होकर सुधांशुसे पीयूषधारा स्रवित होती है, वैसे श्रीराधाके उत्कृष्ट मुखकमलके चञ्चल नेत्रोंसे अनवरत नयन-वारि विगलित हो रहा है।

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५७ पद्यानुवाद— शोभित लोल विलोचन जल ढल आनन कमल उदार। राहु दलित विधुसे बह उठती ज्यों अमृतकी धार॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे माधव ! आपके विरहमें सन्तप्ता श्रीराधाके चञ्चल तथा विस्तृत नेत्रोंसे आँसुओंका तार टूट ही नहीं रहा है। ऐसा लगता है मानो भयङ्कर राहुने अपने दन्तोंसे चन्द्रमाको काट लिया हो और जिनसे अविरल अमृतकी धारा प्रवाहित हो रही हो। श्रीराधाका मुख मानो कमल नहीं, चन्द्रमा हो और आँखोंसे बहते अश्रुबिन्दु अमृत सरीखे हैं। प्रस्तुत पद्यमें उपमा अलङ्कार है। विलिखति रहसि कुरङ्ग-मदेन भवन्तमसमशर-भूतम्। प्रणमति मकरमधये विनिधाय करे च शरं नवचूतम्— सा विरहे तव दीना... ॥५॥ अन्वय—[पुनश्च] रहसि (एकान्ते) कुरङ्गमदेन (कस्तूर्या) असमशरभूतं (कामस्वरूपं) भवन्तं [स्वचित्तोन्मादकत्वात्] विलिखति, अधः (तस्य कामरूपस्य भवतः अधस्तात्) मकरं (कामवाहनं) [विन्यस्य] [लिखितस्य मदनभूतस्य भवतः] करे (हस्ते) नवचूतं (चूताङ्कुरस्वरूपं) शरं विनिधाय (लिखित्वा) [त्वदन्यः कामो नास्तीति मत्वा] प्रणमति च ॥४॥ अनुवाद—हे श्रीकृष्ण ! श्रीराधा एकान्तमें कस्तूरीसे, तुम्हें साक्षात् कन्दर्प मान आम्रमञ्जरीका बाण धारण किये हुए तुम्हारी मोहिनी मूर्त्ति चित्रित करती हैं और वाहन स्थान पर मकर (घड़ियाल) बनाकर प्रणाम करती हैं। पद्यानुवाद— मृगमदसे हरि-चित्र खींचती, फिर लख उसमें 'काम' आम्र-मञ्जरी शर धर करमें, करती सलज प्रणाम।

१५८ श्रीगीतगोविन्दम् जिन चरणोंमें रत माधव! वह, वही बँधासे धीर। देख विमुख, यह चन्द्र जलाकर बढ़ा रहा है पीर॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥ बालबोधिनी-जब श्रीराधा एकान्तमें बैठी होती हैं तो कस्तूरीके रससे आपका चित्र रचती हैं-कामदेवके रूपमें। क्योंकि आपके अतिरिक्त चित्त-उन्मादकारी और कौन हो सकता है अथवा आप ही उसकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसके पश्चात् आपके हाथमें कामका सबसे शक्तिशाली बाण-आम्रमञ्जरीको अङ्कित कर देती है। कामदेवताके रूपमें आपको अभिलिखितकर वाहनके स्थानपर मकर बना देती हैं, पुनश्च काम-तापसे मुक्ति पानेके लिए आपको प्रणाम करती हैं, स्तवन करती हैं। प्रस्तुत पद्यमें उपमा अलङ्कार है। प्रतिपदमिदमपि निगदति माधव तव चरणे पतिताऽहम्। त्वयि विमुखे मयि सपदि सुधानिधिरपि तनुते तनुदाहम्॥ सा विरहे तव दीना... ॥६॥ अन्वय-[न केवलं प्रणमति, परन्तु]-प्रतिपदम् (प्रतिक्षणम्) इदं निगदति च-हे माधव (हे मधुसख) अहं तव चरणे पतिता (त्वामेव शरणं व्रजामीत्यर्थः); [यतः] त्वयि विमुखे [सति] सुधानिधिरपि (अमृतकिरणोऽपि चन्द्रः) मयि सपदि (तत्क्षणादेव) तनुदाहं तनुते (शरीरं भस्मीकरोति) ॥६॥ अनुवाद-हे माधव ! (उस मूर्तिके रूपमें तुम्हें अङ्कित कर बार-बार प्रार्थना करती हैं)-हे श्रीकृष्ण ! मैं आपके चरणोंमें पड़ती हूँ देखो, जैसे ही तुम मुझसे विमुख हो जाते हो, यह अमृत-कलशको धारण करनेवाला चन्द्रमा भी मेरे शरीर पर दाह-वृष्टि करने लगता है।

चतुर्थः सर्गः — स्निग्धमधुसूदनः १५९ बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे श्रीकृष्ण ! श्रीराधा जहाँ-जहाँ भी जाती हैं, वहीं प्रत्येक पग-पग पर कहती हैं—मैं आपके चरणोंमें पड़ी हूँ, आप मुझसे विमुख न हो, आप जब कभी भी मुझसे असन्तुष्ट होते हैं, उसी समय अमृत-निधि चन्द्रमा भी मेरे शरीरमें दाह ही पैदा करता है। रसमञ्जरीकारने ‘माधव’ शब्दसे श्रीराधाका तात्पर्य सङ्केतित करते हुए कहा है कि कृष्ण, ‘मा’ शब्दसे कही जानेवाली लक्ष्मीके धव अर्थात् पति हैं। जब श्रीकृष्ण श्रीराधाके सन्निकट रहते हैं, तब सपत्नी लक्ष्मी भी श्रीराधाका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाती, पराङ्मुख होनेपर तो लक्ष्मीका भाई चन्द्रमा श्रीराधाको अपनी बहनकी सौत समझकर अत्यन्त सन्तप्त करता है। प्रस्तुत श्लोकमें अतिशयोक्ति अलङ्कार है। चन्द्रमा अपने स्वभावके विरुद्ध कार्य कर रहा है, अतएव ‘विरुद्ध’ अलङ्कार भी है। ध्यान-लयेन पुरः परिकल्प्य भवन्तमतीव दुरापम्। विलपति हसति विषीदति रोदिति चञ्चति मुञ्चति तापम् ॥ सा विरहे तव दीना... ॥७॥ अन्वय—[पुनश्च अतिव्यग्रतया ध्यानलयेन भवन्तं साक्षादिव कृत्वा विलपति]—[हे कृष्ण] अतीव दुरापं (दुर्लभं) भवन्तं ध्यानलयेन (समाधियोगेन) पुरः परिकल्प्य (सम्भाव्य) विलपति; [त्वत्प्राप्त्यानन्दोच्छलिता सती] हसति; [पुनस्त्वान्तर्द्धाने] विषीदति, रोदिति च; [पुनः स्फुरन्तं भवन्तमुद्दिश्य] चञ्चति (इतस्ततो धावति); [पुनश्च प्राप्तमिति सम्भाव्य आलिङ्गनादिना] तापं (मनःक्षोभं) मुञ्चति (त्यजति च) ॥७॥ अनुवाद—श्रीराधा तुम्हारे ध्यानमें लीन होकर तुम्हें प्रत्यक्ष रूपमें कल्पित करके विच्छेद यन्त्रणासे कभी विलाप करती हैं, कभी हर्ष प्रकाशित करती हैं तो कभी रोती हैं और कभी स्फूर्तिमें आलिङ्गिता हो सन्तापका परित्याग करती हैं।

१६० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ध्यानमग्न हो चौंक समझती, सम्मुख हैं यदुवीर कभी विलपती, कभी कलपती, होकर अधिक अधीर। बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे श्रीकृष्ण! अन्वेषण आदिके द्वारा श्रीराधाके लिए आप दुष्प्राप्य हो गये हैं, ध्यानमें लीन होकर परिकल्पना करती हैं कि तुम उसके समीप ही हो। सम्मुख अनुभव होनेपर चित्र बनाती है और चित्रलिखित तुम्हें देखने पर अपने निकट जानकर हँसने लगती हैं, मनमें प्रसन्नताकी हिलोरें तरङ्गायित होने लगती हैं, लेकिन आपके द्वारा आलिङ्गन न किये जाने पर उनका उन्मादित अट्टहास क्रन्दनमें बदल जाता है, तुम्हारी कल्पित प्रतिमूर्त्तिके तिरोहित होनेपर पुनः आलिङ्गित करनेका उपक्रम करती हैं। सोचती हैं, यदि श्रीकृष्ण मुझे देखेंगे तो मेरे वशवर्ती हो जाएँगे—इस आभाससे अपनी छटपटाहट, छनछनाहट और सन्तापका परित्याग करती हैं। रसिकप्रियाके अनुसार विलपति न होकर ‘विलिखति’ होना चाहिए। इसमें दीपक अलङ्कार है। नायिकाका किलिकिञ्चित् भाव है ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमधिकं यदि मनसा नटनीयम्। हरि-विरहाकुल-वल्लव-युवति-सखी-वचनं पठनीयम्— सा विरहे तव दीना... ॥८॥ अन्वय—यदि मनसा नटनीयं [नर्त्तयितव्यं], [तर्हि] श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तम्) इदं हरिविरहाकुल-वल्लव- युवति-सखी-वचनम् (हरेः कृष्णस्य विरहेण आकुलायाः वल्लवयुवत्याः श्रीराधायाः सख्याः वचनं दूतीवाक्यम्) अधिकं (यथास्यात् तथा) पठनीयम्॥८॥ अनुवाद—श्रीराधाकी प्रिय सखीद्वारा कथित और श्रीजयदेव द्वारा विरचित यह अष्टपदी मानस-मन्दिरमें अभिनय करने

योग्य है और साथ ही हरिके विरहमें व्याकुल श्रीराधाकी सखीके वचन बार-बार पढ़ने योग्य है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें गीतगोविन्दकार महाकवि श्रीजयदेव कहते हैं कि तरुणी श्रीराधा श्रीकृष्णके विरहमें व्याकुल हैं। सखीने श्रीकृष्णके पास श्रीराधाके प्रणयका निवेदन किया है। सखी द्वारा यह प्रणय-वचनावली मनके द्वारा अभिनय करणीय है। नाट्यमें अभिनय प्रधान होता है, अतः 'नटनीयम्' का अर्थ हुआ अभिनीत किये जाने योग्य। 'नटनीय' का अर्थ रसनीय तथा आस्वादनीय भी है। नाट्यशास्त्रमें भरतमुनिने कहा है—'नटशब्दो रसे मुख्यः'। नट शब्दका मुख्यार्थ 'रस' है। 'श्रीजयदेवभणितमिदमधिकम्'—इस वाक्यांशका अभिप्राय यह है कि श्रीजयदेव कविकी सम्पूर्ण उक्तियोंमें श्रीराधाकी सखीकी उक्ति ही सार-सर्वस्व है। यही वैष्णवों द्वारा भजनीय एवं आस्वादनीय है। आवासो विपिनायते प्रिय-सखी-मालापि जालायते तापोऽपि श्वसितेन दाव-दहन-ज्वाला-कलापायते। सापि त्वद्विरहेण हन्त हरिणी-रूपायते हा कथं कन्दर्पोऽपि यमायते विरचयञ्शार्दूल-विक्रीड़ितम् ॥१॥ अन्वय—[त्वां बिना न कुत्रापि सा निर्वृतिं लभते इत्याह]—हन्त (खेदे) [हे कृष्ण] त्वद्विरहेण (तव विच्छेदेन) सापि (राधापि) हरिणी-रूपायते (आत्मानं हरिणीरूपामिव आचरतीत्यर्थः; श्लेषोक्त्या पाण्डुवर्णा जाता इत्यर्थः); [तथाहि] [तस्याः] आवासः (वसतिस्थानं) विपिनायते (विपिनमिव आचरति; वनीभूतं मन्यते इतिभावः); [तस्याः] प्रियसखीमालापि (प्रियसखीसमूहोपि) जालायते (जालमिव आचरति; स्थानान्तरं गन्तुं प्रतिबध्नातीति भावः); तापः (देह-सन्तापः) अपि

१६२ श्रीगीतगोविन्दम् श्वसितेन (श्वासानिलेन) दाव-दहन-ज्वालाकलापायते (दावदहनस्य दावाग्नेः ज्वाला-कलाप इव आचरति; यथा वातेन अग्नरुल्का निर्दहन्ति तद्वदिति भावः); [किं बहुना] हा, (अत्यन्त-शोक- क्षोभसूचकमव्ययम्) कन्दर्पोऽपि (मदनोऽपि) शार्दूल-विक्रीड़ितं (शार्दुलस्य विक्रीड़ितम् आचरितं) विरचयन् (कुर्वन्) कथं समायते (यम इव आचरति; महदेतदनुचितं मम प्राणहरणचेष्टना- दित्यभिप्रायः); [प्रत्येकेनानेन हरिण्याइव श्रीराधायाः प्रियतमे दृढ़ानुरागः श्रीकृष्णस्य च स्निग्धायामस्नेहव्यवसायात् काठिन्यं प्रदर्शितम्] ॥१॥ अनुवाद—हे श्रीकृष्ण! मेरी सखी श्रीराधा एक हिरनीकी भाँति आचरण करने लगी है, अपने आवासको तो उसने अरण्य मान लिया है, सखीवृन्द उसे किरात-जाल सा भासता है, निज सन्तप्त निःश्वासोंसे अभिवर्द्धित शरीरका सन्ताप दावानल-शिखाकी भाँति प्रतीत हो रहा है। हाय! कन्दर्प भी शार्दूल स्वरूप होकर क्रीड़ा करता हुआ उसके प्राणोंका हनन करनेका उपक्रम करते हुए यम बन गया है। पद्यानुवाद— गृह भी वन सा भास रहा है, (बजी कौन सी भेरी?) उसे सखी भी दीख रही हैं, घेरे बनी अहेरी श्वासोंका उत्ताप जलाता है, दावा की आगी 'काम' व्याघ्रसे डरी-डरी फिरती हरिणी-सी भागी॥ बालबोधिनी—सखीके द्वारा श्रीराधाकी दैन्य-स्थितिका चित्रण हो रहा है। श्रीराधा श्रीकृष्णके वियोगमें हरिणीके समान आचरण कर रही हैं। पाण्डुवर्णा वह श्रीराधा अपने निवास-स्थानको विपिन समझ बैठी हैं। प्रिय-समागम न होनेसे विरह-विदग्धा वह इधर-उधर जाना चाहती है, किन्तु सामने बिछा हुआ है बहेलियारूपी सखियोंका जाल, जिससे

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १६३ वह विवश हो मन मसोस कर रह जाती हैं। उसकी प्रिय सखियाँ ही उसके लिए व्याध-जालके समान बन्धनकारी हो रही हैं। जैसे वनमें लगी अग्निको देखकर हरिणी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है, उसी प्रकार देहके सन्तापके साथ मिलकर दीर्घ निःश्वास दावाग्निके समान अथवा उल्कापातके समान उन्हें तपा रहा है। ओह! ये निःश्वास दावानलकी ज्वालाके समान लगते हैं। मुखसे केवल हाहाकार करती हैं। श्रीकृष्णका सान्निध्य रहने पर जो कामदेव अनुकूल बना रहता है, वह तो शार्दूल-क्रीड़ा कर रहा है, यमराज जैसा लगता है, वह श्रीराधाको मानो मार डालना चाहता है। शार्दूलविक्रीड़ित काम है, बाघकी तरह झपट्टा मारता हुआ उस मासूम हरिणीको और इस श्लोकका छन्द है शार्दूलविक्रीड़ित और यह पूरा छन्द ही जैसे कामदेवकी क्रीड़ा हो। श्रीराधाजीको हरिणीकी उपमा देनेमें भी सार्थकता है। सखी कहना चाहती है कि बुद्धिमान व्यक्ति किसी स्नेहवानके साथ प्रेम करता है। श्रीराधाने तो आपके साथ स्नेह किया है, स्नेहके सागरमें सराबोर रहती हैं और आप कैसे स्नेह-रहित हैं। एकपक्षीय प्रेम तो कोई पशुजाति जीव ही कर सकता है। पुनश्च हरिणी तो वैसे ही देहसे दुर्बल एवं किंकर्तव्यविमूढ़ होती है। निरीह मासूम श्रीराधाको श्रीकृष्णका स्नेह सता रहा है और ऊपरसे उसपर काम अपना पराक्रम दिखा रहा है। यह तो वही विचारी श्रीराधा हैं जो निःस्पृह व्यक्तिसे प्रेम करती हैं। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। लुप्तोत्मा एवं विरोधाभास अलङ्कार है।

१६४ श्रीगीतगोविन्दम् अथ नवमः सन्दर्भः गीतम् ॥९॥ देशाखरागैकतालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यहाँ नवें प्रबन्धका प्रारम्भ होता है। यह गीत देशराग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। बालबोधिनी—जब चन्द्रमाकी किरणें चतुर्दिक दीप्तिशाली हो रही हों और नायक मल्ल-मूर्त्तिमें विशाल भुजाओंके द्वारा विस्फोटका आविष्कार कर लोम हर्षका प्रकाश करता हो, उस समय देशाख राग गाया जाता है। स्तन-विनिहितमपि हारमुदारम्, सा मनुते कृश-तनुरिव भारम्— राधिका विरहे तव केशव ॥१॥ ध्रुवम् अन्वय—[पुनस्तच्चेष्टामेव विशेषतया आह]—हे केशव, तव विरहे कृशतनुः (क्षीणाङ्गी) सा राधिका स्तनविनिहितम् (स्तनन्यस्तम्) उदारम् (मनोहरम्) अपि हारं [शरीरदौर्बल्यात्] भारमिव मनुते (हारवहनस्यापि सामर्थ्यं तस्या नास्तीत्यर्थः) ॥१॥ अनुवाद—केशव ! आपके विरहकी अतिशयताके कारण श्रीराधा ऐसी कृशकाया हो गयी हैं कि स्तनपर रखे हुए मनोहर हारको भी भारस्वरूप समझ रही हैं। पद्यानुवाद— है विरहकी पीर भारी। छीजती जाती 'बिचारी'॥ हार उरका भार बनता। बालबोधिनी—इस प्रबन्धमें सखी पुनः नयी शैलीसे श्रीराधाकी व्यथाका वर्णन करती है। श्रीकृष्णके विरहके कारण श्रीराधाके अङ्ग अत्यधिक कृश हो गये हैं। वक्षःस्थल

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १६५ पर पहनी हुई कमल-पुष्पोंकी मनोहर मालाको भी अपनी शारीरिक दुर्बलताके कारण धारण करनेकी सामर्थ्य उसमें नहीं रही। गीतगोविन्दके दीपिकाकारका कहना है कि 'कम्' सुखका नाम है। श्रीकृष्ण कम्के नियन्ता हैं, इसीलिए केशव कहे जाते हैं। दीपिकाकार आगे कहते हैं 'केश' शब्दका अर्थ है सभीको सुख प्रदान करना। केशव पदका 'व' शब्द युवतियोंके जीवनस्वरूप अमृतका वाचक है। श्रीकृष्ण युवतियोंके जीवनस्वरूप होनेसे केशव कहे जाते हैं। फिर केशवसे स्नेह करनेवाली श्रीराधा दुःखी क्यों? वह विरहमें ऐसी विचित्र बातें कहती हैं जो कही नहीं जातीं—सारे आभूषण भारी ही नहीं, अपितु शाप बन गये हैं—मालाको फेंक देना चाहती हैं। सरस-मसृणमपि मलयज-पङ्कम् पश्यति विषमिव वपुषि सशङ्कम्— राधिका विरहे.... ॥२॥ अन्वय—[न केवलं हार-वहनासमर्था अपि तु] सरसं (आर्द्रं) मसृणम् (सुघृष्टम्) अपि मलयज-पङ्कं (चन्दन-विलेपनं) वपुषि (शरीरे) विषमिव (गरलं यथा) सशङ्कं [यथा स्यात् तथा] पश्यति ॥२॥ अनुवाद—केशव ! विरहवियुक्ता वह श्रीराधा अपने शरीरमें संलग्न सरस, कोमल एवं सुचिक्कण चन्दन-पंकको सशंकित होकर विषकी भाँति देख रही हैं। पद्यानुवाद— मलय विषका सार बनता बालबोधिनी—मलय चन्दनका लेप अत्यन्त चिकना और अतिशय सरस होता है, परन्तु वह समझती हैं कि विषसे उसका लेपन किया गया है। श्रीकृष्णकी विरहव्यथाकी

१६६ श्रीगीतगोविन्दम् व्याकुलतासे सम्प्रति चन्दन-विलेपन श्रीराधाको सुखदायी न होकर दुःखकारी हो रहा है। श्वसित-पवनमनुपम-परिणाहम्। मदन-दहनमिव वहति सदाहम्- राधिका विरहे.... ॥३॥ अन्वय-अनुपम-परिणाहं (अनुपमः अतुलः परिणाहः दैर्घ्यं यस्य तं सुदीर्घमित्यर्थः) सदाहं (दाहसहितं) श्वसित-पवनं (निश्वास-मारुतं) मदन-दहनं (कामाग्निम्) इव बहति [सन्तप्ताया निःश्वासोऽपि सन्तप्त इत्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद-मदनानराकी ज्वालाओंसे सन्तप्त दीर्घ निःश्वास उनके शरीरको दग्ध किये जा रहे हैं, फिर भी वह उनका वहन कर रही है। पद्यानुवाद- श्वासका आधार बनता। दहनका उपचार बनता ॥ बालबोधिनी-विरह-विच्छेदसे अन्तःकरणमें सन्ताप अति असहनीय हो गया है, उपचार करनेके लिए गरम-गरम उसाँस छोड़ती हैं तो लगता है सारा शरीर धधक रहा है, मदन ही इस आगमें धधक रहा है। दिशि दिशि किरति सजल-कण-जालम्। नयन-नलिनमिव विदलितनालम्- राधिका विरहे.... ॥४॥ अन्वय-विदलितनालं (छिन्नवृन्तं) [नलिनमिव] दिशि दिशि (प्रतिदिशं) नयननलिनं सजलकणजालं (जलकणजालैः सह वर्त्तमानं यथातथा) किरति; [नयनादश्रुपातः पद्मात् नीरच्यूतिरिव प्रतिभातीत्यर्थः] ॥४॥ अनुवाद-मृणालसे विच्छिन्न होकर सजल कमलवत्

चतुर्थः सर्गः-स्निग्धमधुसूदनः १६७ नयन-कमलको चारों दिशाओंमें विक्षिप्त कर अश्रुकणकी वृष्टि कर रही है। पद्यानुवाद- आँखमें आँसू उमंगते कमल-कण सरमें तरंगते खोजती दिशि दिशि सहमते प्रिय! कहाँ हो तुम विरमते ? बालबोधिनी-उसकी आँखें ऐसी लगती हैं, जैसे कमल हों, पर उस कमलका नाल विगलित हो गया है। आँसुओंसे भरे नेत्र जलकणोंसे युक्त नीलकमलोंके समान मनोहर लगते हैं। आँसुओंके तारोंसे दिशाएँ आबद्ध हो जाती हैं, एक जाल-सा तन जाता है, अवरुद्ध हो जाती हैं दिशाएँ। आपके आगमनकी प्रतीक्षामें चारों ओर देखती रहती हैं कि आप किसी दिशासे आते हुए दिखायी पड़ जाएँ। नाल गल जाने पर जैसे कमलकी स्थिति नहीं रहती, वैसे ही उनकी आँखें कहीं नहीं ठहरतीं। कहीं कोई आधार नहीं, जिसपर वह अपनी दृष्टि टिका सकें। इस श्लोकमें उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। त्यजति न पाणि-तलेन कपोलम्। बाल-शशिनमिव सायमसोलम्- राधिका विरहे....॥५॥ अन्वय-सायं (सन्ध्यायां) (रागरञ्जिते आकाशतले संलग्नमिति शेषः) अलोलं (अचञ्चलं) बालशशिनमिव (तरुणचन्द्रमिव) पाणितलेन (करतलेन सुलोहितेनेत्यर्थः) कपोलं (विरहपाण्डुरं गण्डदेशं) [कपोलस्य अर्द्धभागमात्रदर्शनात् आताम्रत्वात् पाण्डुत्वाच्च बालचन्द्रेण अस्योपमा] न त्यजति (धारयतीति भावः) ॥५॥