भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 448 में से

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१५६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे माधव ! विविध विलासोंसे रमणीय कुसुम-शय्या श्रीराधाके द्वारा रचायी जा रही है, जो कामदेवके बाणोंकी शय्याके समान प्रतीत हो रही है। आपके गाढ़ आलिङ्गनकी प्राप्तिकी आशासे वह कठोर-शरशय्याव्रतके अनुष्ठानका पालन कर रही है। बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! महान केलि-कला-विलासरूप पुष्प-शय्याकी रचना आपके विरहमें विदग्ध होकर श्रीराधा करती तो हैं, पर वह सेज काम-शरोंकी सेज सदृश ही है। उत्प्रेक्षा करते हुए सखी कहती है—जैसे कोई व्यक्ति किसी बड़े सुखकी प्राप्तिके लिए कोई व्रत करता है, उसी प्रकार श्रीराधा भी दुष्प्राप्य आपके आलिङ्गन-सुखकी प्राप्तिके लिए दुष्कर शरशय्या-व्रतकी साधना कर रही है। वहति च चलित-विलोचन-जलभरमानन-कमलमुदारम्। विधुमिव विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन-गलितामृतधारम्॥ सा विरहे तव दीना... ॥४॥ अन्वय—[किञ्च] वलित-विलोचन-जलधरं (वलितानि अविरतं गलितानि विलोचनयोः नेत्रयोः जलानि धारयतीति तथोक्तम्) उदारम् (विकस्वरम्) आननकमलं (मुखपद्मं) विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन गलितामृतधारं (विकटस्य करालस्य विधुन्तुदस्य राहोः दन्तदलनेन चर्वणेन गलिता अमृतधारा यस्मात् तं) विधुम् (चन्द्रम्) इव बहति (रोदितीति भावः; तेन च वदनमस्याः निष्पीडितसुधासारं सुधाकरमिव सम्भावयामि) ॥४॥ अनुवाद—जैसे कराल राहुके दशनसे संदशित होकर सुधांशुसे पीयूषधारा स्रवित होती है, वैसे श्रीराधाके उत्कृष्ट मुखकमलके चञ्चल नेत्रोंसे अनवरत नयन-वारि विगलित हो रहा है।

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