भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५७ पद्यानुवाद— शोभित लोल विलोचन जल ढल आनन कमल उदार। राहु दलित विधुसे बह उठती ज्यों अमृतकी धार॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे माधव ! आपके विरहमें सन्तप्ता श्रीराधाके चञ्चल तथा विस्तृत नेत्रोंसे आँसुओंका तार टूट ही नहीं रहा है। ऐसा लगता है मानो भयङ्कर राहुने अपने दन्तोंसे चन्द्रमाको काट लिया हो और जिनसे अविरल अमृतकी धारा प्रवाहित हो रही हो। श्रीराधाका मुख मानो कमल नहीं, चन्द्रमा हो और आँखोंसे बहते अश्रुबिन्दु अमृत सरीखे हैं। प्रस्तुत पद्यमें उपमा अलङ्कार है। विलिखति रहसि कुरङ्ग-मदेन भवन्तमसमशर-भूतम्। प्रणमति मकरमधये विनिधाय करे च शरं नवचूतम्— सा विरहे तव दीना... ॥५॥ अन्वय—[पुनश्च] रहसि (एकान्ते) कुरङ्गमदेन (कस्तूर्या) असमशरभूतं (कामस्वरूपं) भवन्तं [स्वचित्तोन्मादकत्वात्] विलिखति, अधः (तस्य कामरूपस्य भवतः अधस्तात्) मकरं (कामवाहनं) [विन्यस्य] [लिखितस्य मदनभूतस्य भवतः] करे (हस्ते) नवचूतं (चूताङ्कुरस्वरूपं) शरं विनिधाय (लिखित्वा) [त्वदन्यः कामो नास्तीति मत्वा] प्रणमति च ॥४॥ अनुवाद—हे श्रीकृष्ण ! श्रीराधा एकान्तमें कस्तूरीसे, तुम्हें साक्षात् कन्दर्प मान आम्रमञ्जरीका बाण धारण किये हुए तुम्हारी मोहिनी मूर्त्ति चित्रित करती हैं और वाहन स्थान पर मकर (घड़ियाल) बनाकर प्रणाम करती हैं। पद्यानुवाद— मृगमदसे हरि-चित्र खींचती, फिर लख उसमें 'काम' आम्र-मञ्जरी शर धर करमें, करती सलज प्रणाम।