गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ श्रीगीतगोविन्दम् जिन चरणोंमें रत माधव! वह, वही बँधासे धीर। देख विमुख, यह चन्द्र जलाकर बढ़ा रहा है पीर॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥ बालबोधिनी-जब श्रीराधा एकान्तमें बैठी होती हैं तो कस्तूरीके रससे आपका चित्र रचती हैं-कामदेवके रूपमें। क्योंकि आपके अतिरिक्त चित्त-उन्मादकारी और कौन हो सकता है अथवा आप ही उसकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसके पश्चात् आपके हाथमें कामका सबसे शक्तिशाली बाण-आम्रमञ्जरीको अङ्कित कर देती है। कामदेवताके रूपमें आपको अभिलिखितकर वाहनके स्थानपर मकर बना देती हैं, पुनश्च काम-तापसे मुक्ति पानेके लिए आपको प्रणाम करती हैं, स्तवन करती हैं। प्रस्तुत पद्यमें उपमा अलङ्कार है। प्रतिपदमिदमपि निगदति माधव तव चरणे पतिताऽहम्। त्वयि विमुखे मयि सपदि सुधानिधिरपि तनुते तनुदाहम्॥ सा विरहे तव दीना... ॥६॥ अन्वय-[न केवलं प्रणमति, परन्तु]-प्रतिपदम् (प्रतिक्षणम्) इदं निगदति च-हे माधव (हे मधुसख) अहं तव चरणे पतिता (त्वामेव शरणं व्रजामीत्यर्थः); [यतः] त्वयि विमुखे [सति] सुधानिधिरपि (अमृतकिरणोऽपि चन्द्रः) मयि सपदि (तत्क्षणादेव) तनुदाहं तनुते (शरीरं भस्मीकरोति) ॥६॥ अनुवाद-हे माधव ! (उस मूर्तिके रूपमें तुम्हें अङ्कित कर बार-बार प्रार्थना करती हैं)-हे श्रीकृष्ण ! मैं आपके चरणोंमें पड़ती हूँ देखो, जैसे ही तुम मुझसे विमुख हो जाते हो, यह अमृत-कलशको धारण करनेवाला चन्द्रमा भी मेरे शरीर पर दाह-वृष्टि करने लगता है।