भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 448 में से

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चतुर्थः सर्गः — स्निग्धमधुसूदनः १५९ बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे श्रीकृष्ण ! श्रीराधा जहाँ-जहाँ भी जाती हैं, वहीं प्रत्येक पग-पग पर कहती हैं—मैं आपके चरणोंमें पड़ी हूँ, आप मुझसे विमुख न हो, आप जब कभी भी मुझसे असन्तुष्ट होते हैं, उसी समय अमृत-निधि चन्द्रमा भी मेरे शरीरमें दाह ही पैदा करता है। रसमञ्जरीकारने ‘माधव’ शब्दसे श्रीराधाका तात्पर्य सङ्केतित करते हुए कहा है कि कृष्ण, ‘मा’ शब्दसे कही जानेवाली लक्ष्मीके धव अर्थात् पति हैं। जब श्रीकृष्ण श्रीराधाके सन्निकट रहते हैं, तब सपत्नी लक्ष्मी भी श्रीराधाका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाती, पराङ्मुख होनेपर तो लक्ष्मीका भाई चन्द्रमा श्रीराधाको अपनी बहनकी सौत समझकर अत्यन्त सन्तप्त करता है। प्रस्तुत श्लोकमें अतिशयोक्ति अलङ्कार है। चन्द्रमा अपने स्वभावके विरुद्ध कार्य कर रहा है, अतएव ‘विरुद्ध’ अलङ्कार भी है। ध्यान-लयेन पुरः परिकल्प्य भवन्तमतीव दुरापम्। विलपति हसति विषीदति रोदिति चञ्चति मुञ्चति तापम् ॥ सा विरहे तव दीना... ॥७॥ अन्वय—[पुनश्च अतिव्यग्रतया ध्यानलयेन भवन्तं साक्षादिव कृत्वा विलपति]—[हे कृष्ण] अतीव दुरापं (दुर्लभं) भवन्तं ध्यानलयेन (समाधियोगेन) पुरः परिकल्प्य (सम्भाव्य) विलपति; [त्वत्प्राप्त्यानन्दोच्छलिता सती] हसति; [पुनस्त्वान्तर्द्धाने] विषीदति, रोदिति च; [पुनः स्फुरन्तं भवन्तमुद्दिश्य] चञ्चति (इतस्ततो धावति); [पुनश्च प्राप्तमिति सम्भाव्य आलिङ्गनादिना] तापं (मनःक्षोभं) मुञ्चति (त्यजति च) ॥७॥ अनुवाद—श्रीराधा तुम्हारे ध्यानमें लीन होकर तुम्हें प्रत्यक्ष रूपमें कल्पित करके विच्छेद यन्त्रणासे कभी विलाप करती हैं, कभी हर्ष प्रकाशित करती हैं तो कभी रोती हैं और कभी स्फूर्तिमें आलिङ्गिता हो सन्तापका परित्याग करती हैं।

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