गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ध्यानमग्न हो चौंक समझती, सम्मुख हैं यदुवीर कभी विलपती, कभी कलपती, होकर अधिक अधीर। बालबोधिनी—सखी कह रही है—हे श्रीकृष्ण! अन्वेषण आदिके द्वारा श्रीराधाके लिए आप दुष्प्राप्य हो गये हैं, ध्यानमें लीन होकर परिकल्पना करती हैं कि तुम उसके समीप ही हो। सम्मुख अनुभव होनेपर चित्र बनाती है और चित्रलिखित तुम्हें देखने पर अपने निकट जानकर हँसने लगती हैं, मनमें प्रसन्नताकी हिलोरें तरङ्गायित होने लगती हैं, लेकिन आपके द्वारा आलिङ्गन न किये जाने पर उनका उन्मादित अट्टहास क्रन्दनमें बदल जाता है, तुम्हारी कल्पित प्रतिमूर्त्तिके तिरोहित होनेपर पुनः आलिङ्गित करनेका उपक्रम करती हैं। सोचती हैं, यदि श्रीकृष्ण मुझे देखेंगे तो मेरे वशवर्ती हो जाएँगे—इस आभाससे अपनी छटपटाहट, छनछनाहट और सन्तापका परित्याग करती हैं। रसिकप्रियाके अनुसार विलपति न होकर ‘विलिखति’ होना चाहिए। इसमें दीपक अलङ्कार है। नायिकाका किलिकिञ्चित् भाव है ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमधिकं यदि मनसा नटनीयम्। हरि-विरहाकुल-वल्लव-युवति-सखी-वचनं पठनीयम्— सा विरहे तव दीना... ॥८॥ अन्वय—यदि मनसा नटनीयं [नर्त्तयितव्यं], [तर्हि] श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तम्) इदं हरिविरहाकुल-वल्लव- युवति-सखी-वचनम् (हरेः कृष्णस्य विरहेण आकुलायाः वल्लवयुवत्याः श्रीराधायाः सख्याः वचनं दूतीवाक्यम्) अधिकं (यथास्यात् तथा) पठनीयम्॥८॥ अनुवाद—श्रीराधाकी प्रिय सखीद्वारा कथित और श्रीजयदेव द्वारा विरचित यह अष्टपदी मानस-मन्दिरमें अभिनय करने