भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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योग्य है और साथ ही हरिके विरहमें व्याकुल श्रीराधाकी सखीके वचन बार-बार पढ़ने योग्य है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें गीतगोविन्दकार महाकवि श्रीजयदेव कहते हैं कि तरुणी श्रीराधा श्रीकृष्णके विरहमें व्याकुल हैं। सखीने श्रीकृष्णके पास श्रीराधाके प्रणयका निवेदन किया है। सखी द्वारा यह प्रणय-वचनावली मनके द्वारा अभिनय करणीय है। नाट्यमें अभिनय प्रधान होता है, अतः 'नटनीयम्' का अर्थ हुआ अभिनीत किये जाने योग्य। 'नटनीय' का अर्थ रसनीय तथा आस्वादनीय भी है। नाट्यशास्त्रमें भरतमुनिने कहा है—'नटशब्दो रसे मुख्यः'। नट शब्दका मुख्यार्थ 'रस' है। 'श्रीजयदेवभणितमिदमधिकम्'—इस वाक्यांशका अभिप्राय यह है कि श्रीजयदेव कविकी सम्पूर्ण उक्तियोंमें श्रीराधाकी सखीकी उक्ति ही सार-सर्वस्व है। यही वैष्णवों द्वारा भजनीय एवं आस्वादनीय है। आवासो विपिनायते प्रिय-सखी-मालापि जालायते तापोऽपि श्वसितेन दाव-दहन-ज्वाला-कलापायते। सापि त्वद्विरहेण हन्त हरिणी-रूपायते हा कथं कन्दर्पोऽपि यमायते विरचयञ्शार्दूल-विक्रीड़ितम् ॥१॥ अन्वय—[त्वां बिना न कुत्रापि सा निर्वृतिं लभते इत्याह]—हन्त (खेदे) [हे कृष्ण] त्वद्विरहेण (तव विच्छेदेन) सापि (राधापि) हरिणी-रूपायते (आत्मानं हरिणीरूपामिव आचरतीत्यर्थः; श्लेषोक्त्या पाण्डुवर्णा जाता इत्यर्थः); [तथाहि] [तस्याः] आवासः (वसतिस्थानं) विपिनायते (विपिनमिव आचरति; वनीभूतं मन्यते इतिभावः); [तस्याः] प्रियसखीमालापि (प्रियसखीसमूहोपि) जालायते (जालमिव आचरति; स्थानान्तरं गन्तुं प्रतिबध्नातीति भावः); तापः (देह-सन्तापः) अपि