भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१६२ श्रीगीतगोविन्दम् श्वसितेन (श्वासानिलेन) दाव-दहन-ज्वालाकलापायते (दावदहनस्य दावाग्नेः ज्वाला-कलाप इव आचरति; यथा वातेन अग्नरुल्का निर्दहन्ति तद्वदिति भावः); [किं बहुना] हा, (अत्यन्त-शोक- क्षोभसूचकमव्ययम्) कन्दर्पोऽपि (मदनोऽपि) शार्दूल-विक्रीड़ितं (शार्दुलस्य विक्रीड़ितम् आचरितं) विरचयन् (कुर्वन्) कथं समायते (यम इव आचरति; महदेतदनुचितं मम प्राणहरणचेष्टना- दित्यभिप्रायः); [प्रत्येकेनानेन हरिण्याइव श्रीराधायाः प्रियतमे दृढ़ानुरागः श्रीकृष्णस्य च स्निग्धायामस्नेहव्यवसायात् काठिन्यं प्रदर्शितम्] ॥१॥ अनुवाद—हे श्रीकृष्ण! मेरी सखी श्रीराधा एक हिरनीकी भाँति आचरण करने लगी है, अपने आवासको तो उसने अरण्य मान लिया है, सखीवृन्द उसे किरात-जाल सा भासता है, निज सन्तप्त निःश्वासोंसे अभिवर्द्धित शरीरका सन्ताप दावानल-शिखाकी भाँति प्रतीत हो रहा है। हाय! कन्दर्प भी शार्दूल स्वरूप होकर क्रीड़ा करता हुआ उसके प्राणोंका हनन करनेका उपक्रम करते हुए यम बन गया है। पद्यानुवाद— गृह भी वन सा भास रहा है, (बजी कौन सी भेरी?) उसे सखी भी दीख रही हैं, घेरे बनी अहेरी श्वासोंका उत्ताप जलाता है, दावा की आगी 'काम' व्याघ्रसे डरी-डरी फिरती हरिणी-सी भागी॥ बालबोधिनी—सखीके द्वारा श्रीराधाकी दैन्य-स्थितिका चित्रण हो रहा है। श्रीराधा श्रीकृष्णके वियोगमें हरिणीके समान आचरण कर रही हैं। पाण्डुवर्णा वह श्रीराधा अपने निवास-स्थानको विपिन समझ बैठी हैं। प्रिय-समागम न होनेसे विरह-विदग्धा वह इधर-उधर जाना चाहती है, किन्तु सामने बिछा हुआ है बहेलियारूपी सखियोंका जाल, जिससे