भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १६३ वह विवश हो मन मसोस कर रह जाती हैं। उसकी प्रिय सखियाँ ही उसके लिए व्याध-जालके समान बन्धनकारी हो रही हैं। जैसे वनमें लगी अग्निको देखकर हरिणी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है, उसी प्रकार देहके सन्तापके साथ मिलकर दीर्घ निःश्वास दावाग्निके समान अथवा उल्कापातके समान उन्हें तपा रहा है। ओह! ये निःश्वास दावानलकी ज्वालाके समान लगते हैं। मुखसे केवल हाहाकार करती हैं। श्रीकृष्णका सान्निध्य रहने पर जो कामदेव अनुकूल बना रहता है, वह तो शार्दूल-क्रीड़ा कर रहा है, यमराज जैसा लगता है, वह श्रीराधाको मानो मार डालना चाहता है। शार्दूलविक्रीड़ित काम है, बाघकी तरह झपट्टा मारता हुआ उस मासूम हरिणीको और इस श्लोकका छन्द है शार्दूलविक्रीड़ित और यह पूरा छन्द ही जैसे कामदेवकी क्रीड़ा हो। श्रीराधाजीको हरिणीकी उपमा देनेमें भी सार्थकता है। सखी कहना चाहती है कि बुद्धिमान व्यक्ति किसी स्नेहवानके साथ प्रेम करता है। श्रीराधाने तो आपके साथ स्नेह किया है, स्नेहके सागरमें सराबोर रहती हैं और आप कैसे स्नेह-रहित हैं। एकपक्षीय प्रेम तो कोई पशुजाति जीव ही कर सकता है। पुनश्च हरिणी तो वैसे ही देहसे दुर्बल एवं किंकर्तव्यविमूढ़ होती है। निरीह मासूम श्रीराधाको श्रीकृष्णका स्नेह सता रहा है और ऊपरसे उसपर काम अपना पराक्रम दिखा रहा है। यह तो वही विचारी श्रीराधा हैं जो निःस्पृह व्यक्तिसे प्रेम करती हैं। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। लुप्तोत्मा एवं विरोधाभास अलङ्कार है।