गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 196, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ श्रीगीतगोविन्दम् अथ नवमः सन्दर्भः गीतम् ॥९॥ देशाखरागैकतालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यहाँ नवें प्रबन्धका प्रारम्भ होता है। यह गीत देशराग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। बालबोधिनी—जब चन्द्रमाकी किरणें चतुर्दिक दीप्तिशाली हो रही हों और नायक मल्ल-मूर्त्तिमें विशाल भुजाओंके द्वारा विस्फोटका आविष्कार कर लोम हर्षका प्रकाश करता हो, उस समय देशाख राग गाया जाता है। स्तन-विनिहितमपि हारमुदारम्, सा मनुते कृश-तनुरिव भारम्— राधिका विरहे तव केशव ॥१॥ ध्रुवम् अन्वय—[पुनस्तच्चेष्टामेव विशेषतया आह]—हे केशव, तव विरहे कृशतनुः (क्षीणाङ्गी) सा राधिका स्तनविनिहितम् (स्तनन्यस्तम्) उदारम् (मनोहरम्) अपि हारं [शरीरदौर्बल्यात्] भारमिव मनुते (हारवहनस्यापि सामर्थ्यं तस्या नास्तीत्यर्थः) ॥१॥ अनुवाद—केशव ! आपके विरहकी अतिशयताके कारण श्रीराधा ऐसी कृशकाया हो गयी हैं कि स्तनपर रखे हुए मनोहर हारको भी भारस्वरूप समझ रही हैं। पद्यानुवाद— है विरहकी पीर भारी। छीजती जाती 'बिचारी'॥ हार उरका भार बनता। बालबोधिनी—इस प्रबन्धमें सखी पुनः नयी शैलीसे श्रीराधाकी व्यथाका वर्णन करती है। श्रीकृष्णके विरहके कारण श्रीराधाके अङ्ग अत्यधिक कृश हो गये हैं। वक्षःस्थल