भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 448 में से

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चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १६५ पर पहनी हुई कमल-पुष्पोंकी मनोहर मालाको भी अपनी शारीरिक दुर्बलताके कारण धारण करनेकी सामर्थ्य उसमें नहीं रही। गीतगोविन्दके दीपिकाकारका कहना है कि 'कम्' सुखका नाम है। श्रीकृष्ण कम्के नियन्ता हैं, इसीलिए केशव कहे जाते हैं। दीपिकाकार आगे कहते हैं 'केश' शब्दका अर्थ है सभीको सुख प्रदान करना। केशव पदका 'व' शब्द युवतियोंके जीवनस्वरूप अमृतका वाचक है। श्रीकृष्ण युवतियोंके जीवनस्वरूप होनेसे केशव कहे जाते हैं। फिर केशवसे स्नेह करनेवाली श्रीराधा दुःखी क्यों? वह विरहमें ऐसी विचित्र बातें कहती हैं जो कही नहीं जातीं—सारे आभूषण भारी ही नहीं, अपितु शाप बन गये हैं—मालाको फेंक देना चाहती हैं। सरस-मसृणमपि मलयज-पङ्कम् पश्यति विषमिव वपुषि सशङ्कम्— राधिका विरहे.... ॥२॥ अन्वय—[न केवलं हार-वहनासमर्था अपि तु] सरसं (आर्द्रं) मसृणम् (सुघृष्टम्) अपि मलयज-पङ्कं (चन्दन-विलेपनं) वपुषि (शरीरे) विषमिव (गरलं यथा) सशङ्कं [यथा स्यात् तथा] पश्यति ॥२॥ अनुवाद—केशव ! विरहवियुक्ता वह श्रीराधा अपने शरीरमें संलग्न सरस, कोमल एवं सुचिक्कण चन्दन-पंकको सशंकित होकर विषकी भाँति देख रही हैं। पद्यानुवाद— मलय विषका सार बनता बालबोधिनी—मलय चन्दनका लेप अत्यन्त चिकना और अतिशय सरस होता है, परन्तु वह समझती हैं कि विषसे उसका लेपन किया गया है। श्रीकृष्णकी विरहव्यथाकी

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