गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ श्रीगीतगोविन्दम् व्याकुलतासे सम्प्रति चन्दन-विलेपन श्रीराधाको सुखदायी न होकर दुःखकारी हो रहा है। श्वसित-पवनमनुपम-परिणाहम्। मदन-दहनमिव वहति सदाहम्- राधिका विरहे.... ॥३॥ अन्वय-अनुपम-परिणाहं (अनुपमः अतुलः परिणाहः दैर्घ्यं यस्य तं सुदीर्घमित्यर्थः) सदाहं (दाहसहितं) श्वसित-पवनं (निश्वास-मारुतं) मदन-दहनं (कामाग्निम्) इव बहति [सन्तप्ताया निःश्वासोऽपि सन्तप्त इत्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद-मदनानराकी ज्वालाओंसे सन्तप्त दीर्घ निःश्वास उनके शरीरको दग्ध किये जा रहे हैं, फिर भी वह उनका वहन कर रही है। पद्यानुवाद- श्वासका आधार बनता। दहनका उपचार बनता ॥ बालबोधिनी-विरह-विच्छेदसे अन्तःकरणमें सन्ताप अति असहनीय हो गया है, उपचार करनेके लिए गरम-गरम उसाँस छोड़ती हैं तो लगता है सारा शरीर धधक रहा है, मदन ही इस आगमें धधक रहा है। दिशि दिशि किरति सजल-कण-जालम्। नयन-नलिनमिव विदलितनालम्- राधिका विरहे.... ॥४॥ अन्वय-विदलितनालं (छिन्नवृन्तं) [नलिनमिव] दिशि दिशि (प्रतिदिशं) नयननलिनं सजलकणजालं (जलकणजालैः सह वर्त्तमानं यथातथा) किरति; [नयनादश्रुपातः पद्मात् नीरच्यूतिरिव प्रतिभातीत्यर्थः] ॥४॥ अनुवाद-मृणालसे विच्छिन्न होकर सजल कमलवत्