भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः-स्निग्धमधुसूदनः १६७ नयन-कमलको चारों दिशाओंमें विक्षिप्त कर अश्रुकणकी वृष्टि कर रही है। पद्यानुवाद- आँखमें आँसू उमंगते कमल-कण सरमें तरंगते खोजती दिशि दिशि सहमते प्रिय! कहाँ हो तुम विरमते ? बालबोधिनी-उसकी आँखें ऐसी लगती हैं, जैसे कमल हों, पर उस कमलका नाल विगलित हो गया है। आँसुओंसे भरे नेत्र जलकणोंसे युक्त नीलकमलोंके समान मनोहर लगते हैं। आँसुओंके तारोंसे दिशाएँ आबद्ध हो जाती हैं, एक जाल-सा तन जाता है, अवरुद्ध हो जाती हैं दिशाएँ। आपके आगमनकी प्रतीक्षामें चारों ओर देखती रहती हैं कि आप किसी दिशासे आते हुए दिखायी पड़ जाएँ। नाल गल जाने पर जैसे कमलकी स्थिति नहीं रहती, वैसे ही उनकी आँखें कहीं नहीं ठहरतीं। कहीं कोई आधार नहीं, जिसपर वह अपनी दृष्टि टिका सकें। इस श्लोकमें उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। त्यजति न पाणि-तलेन कपोलम्। बाल-शशिनमिव सायमसोलम्- राधिका विरहे....॥५॥ अन्वय-सायं (सन्ध्यायां) (रागरञ्जिते आकाशतले संलग्नमिति शेषः) अलोलं (अचञ्चलं) बालशशिनमिव (तरुणचन्द्रमिव) पाणितलेन (करतलेन सुलोहितेनेत्यर्थः) कपोलं (विरहपाण्डुरं गण्डदेशं) [कपोलस्य अर्द्धभागमात्रदर्शनात् आताम्रत्वात् पाण्डुत्वाच्च बालचन्द्रेण अस्योपमा] न त्यजति (धारयतीति भावः) ॥५॥