गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—अरुणवर्णके कर-कमल पर कपोलको सन्ध्या समयमें आकाश-स्थित चन्द्रकलाकी शोभाके समान धारण किये एकान्तमें बैठी रहती हैं। पद्यानुवाद— हाथ पर हनु धर सरसती बाल विधु शोभा बरसती। बालबोधिनी—किंकर्त्तव्यविमूढ़ श्रीराधा जड़-सी हो गयी हैं। उनकी एक हथेली बराबर उनके गालों पर लगी रहती है, चिन्तामग्न होनेके कारण उसे छोड़ती नहीं। दिन किसी प्रकार निकल जाता है, पर क्या होगा जब रात आयेगी, वह तो मेरे लिए एक युगके समान होगी। सायंकालके चन्द्रमाके समान उनका मुख क्षीणकान्ति निस्तेज, शान्त तथा हाथसे आधा ढका हुआ द्वितीयाके चन्द्रमाके समान लगता है। सन्ध्या जैसे बाल चन्द्रमाको टिकाये रहती है, उसी प्रकार हथेलीका कवच मानो उसे सुरक्षा प्रदान कर रहा है। हाथसे ढके हुए अर्द्धदृश्यमान मुखकी उपमा चन्द्रमासे दी गयी है। नयन-विषयमपि किसलय-तल्पम्। कलयति विहित-हुताशवि-कल्पम्— राधिका विरहे.... ॥६॥ अन्वय—किशलय-तल्पमपि (पल्लव-शय्यामपि) नयन- विषयं (नेत्रगोचरं) विहित-हुताश-विकल्पं (विहितः जनितः हुताशस्य अग्नेः विकल्पः भ्रमो यत्र तादृशं यथा स्यात् तथा) गणयति (मन्यते) ॥६॥ अनुवाद—मनोरम नवीन पल्लवोंकी शय्याको साक्षात् रूपसे विद्यमान देखकर भी उसे विभ्रमके कारण प्रदीप्त हुताशन (आग) के समान मान रही हैं।