गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १६९ पद्यानुवाद— पल्लवोंकी सेज लखती ‘आग-सी’ कहती—सुलगती। बालबोधिनी—विरहमें श्रीराधा उद्विग्ना हो गयी हैं। सामने नये-नये लाल-लाल किसलयोंसे निर्मित शय्याको देखती हैं तो उसे लगता है जैसे चिता रची गयी है, उस चितामें आग धधक रही है। प्रत्यक्षमें श्रीराधाको भ्रम हो रहा है, क्योंकि उनकी आँखें आपमें लगी हुई हैं। अग्निके समान ताम्र-वर्ण वाले नवीन पल्लवोंसे रचित शय्यामें अग्निका भ्रम हो रहा है उसे। सदृश वस्तुमें ही सदृश वस्तुका संशय होता है। अग्नि ताम्रवर्णका तथा सन्तापकारक होती है, किसलय भी ताम्रवर्णका विरहिणियोंके लिए सन्तापकारी होता है। श्रीराधाको किसलयमें आगका भ्रम हो रहा है। हरिरिति हरिरिति जपति सकामम्। विरह-विहित-मरणेव निकामम्— राधिका विरहे.... ॥७॥ अन्वय—विरहविहित-मरणा (त्वद्विरहेण विहितम् अवधारितं मरणं यस्याः सा) इव [सती] निकामं (मरणे या मतिः सा एव जीवस्य गतिरिति मत्वा अनवरतं) सकामं (साभिलाषं) हरिरिति हरिरिति जपति ॥७॥ अनुवाद—विरहके कारण उनका प्राणत्याग निश्चित-सा हो गया है, श्रीराधा निरन्तर ‘श्रीहरि, श्रीहरि’ इस नामका आपकी प्राप्तिकी कामनासे जप करती रहती हैं। पद्यानुवाद— अहर्निश हरि-नाम जपत्ती मृत्यु क्षण क्षण झलक टलती। बालबोधिनी—श्रीराधाका विरहानलमें दग्ध होनेके कारण यह निश्चित-सा ही हो गया है कि अब उनके प्राण बचेंगे