गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० श्रीगीतगोविन्दम् नहीं। संसारसे निराश तथा मुमुर्षु जन जैसे श्रीहरिका अहर्निश नाम जपते हैं, उसी प्रकार श्रीराधा भी आपकी प्राप्तिकी अभिलाषासे सर्वदा श्रीहरिका नाम जपत्ती रहती हैं। प्रणत-क्लेश-नाशन होनेसे श्रीकृष्ण हरि कहे जाते हैं। हरि-हरि जप करनेसे इस जन्ममें न सही, दूसरे जन्ममें वे अवश्य ही प्रियतमके रूपमें प्राप्त होंगे—इसी कामनाको लेकर जप कर रही हैं। श्रीजयदेव-भणितमिति गीतम्। सुखयतु केशव-पदमुपनीतम् ॥ राधिका विरहे.... ॥९॥ अन्वय—इति (उक्तप्रकारेण) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तं) गीतं केशव-पदं (श्रीकृष्णपदम्) उपनीतं (प्राप्तं; तत्पदयोः समर्पित-चित्तमिति यावत्) [भक्तम्] सुखयतु (सुखीकरोतु) ॥९॥ अनुवाद—श्रीजयदेव प्रणीत यह गीत श्रीकृष्णके चरणोंमें शरणागत हुए वैष्णवोंका सुख विधान करे। पद्यानुवाद— गीतमें 'कवि' भींगते हैं हरि स्वयं आ रीझते हैं। है विरहकी पीर भारी छीजती जाती बिचारी ॥ बालबोधिनी—श्रीजयदेवके द्वारा नवें प्रबन्धके रूपमें श्रीहरिका यह गीत प्रस्तुत हुआ है। यह गीत 'भक्तजनोंको सुख देगा', श्रीराधाकी इस चित्त-भूमिका स्मरण सीधे केशव-चरणोंमें पहुँचेगा। इस गीतको कविने वैष्णवोंके सान्निध्यमें गाया है। यहाँ 'केशव' पद वैष्णवोंका वाचक है। 'केशवः पदं = स्थानं यस्याऽसौ तं केशवपदम्' अर्थात् भगवान् जिनके द्वारा प्राप्य हैं, वे वैष्णव ही केशव पद-वाच्य हैं।