भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 202

१७० श्रीगीतगोविन्दम् नहीं। संसारसे निराश तथा मुमुर्षु जन जैसे श्रीहरिका अहर्निश नाम जपते हैं, उसी प्रकार श्रीराधा भी आपकी प्राप्तिकी अभिलाषासे सर्वदा श्रीहरिका नाम जपत्ती रहती हैं। प्रणत-क्लेश-नाशन होनेसे श्रीकृष्ण हरि कहे जाते हैं। हरि-हरि जप करनेसे इस जन्ममें न सही, दूसरे जन्ममें वे अवश्य ही प्रियतमके रूपमें प्राप्त होंगे—इसी कामनाको लेकर जप कर रही हैं। श्रीजयदेव-भणितमिति गीतम्। सुखयतु केशव-पदमुपनीतम् ॥ राधिका विरहे.... ॥९॥ अन्वय—इति (उक्तप्रकारेण) श्रीजयदेव-भणितं (श्रीजयदेवोक्तं) गीतं केशव-पदं (श्रीकृष्णपदम्) उपनीतं (प्राप्तं; तत्पदयोः समर्पित-चित्तमिति यावत्) [भक्तम्] सुखयतु (सुखीकरोतु) ॥९॥ अनुवाद—श्रीजयदेव प्रणीत यह गीत श्रीकृष्णके चरणोंमें शरणागत हुए वैष्णवोंका सुख विधान करे। पद्यानुवाद— गीतमें 'कवि' भींगते हैं हरि स्वयं आ रीझते हैं। है विरहकी पीर भारी छीजती जाती बिचारी ॥ बालबोधिनी—श्रीजयदेवके द्वारा नवें प्रबन्धके रूपमें श्रीहरिका यह गीत प्रस्तुत हुआ है। यह गीत 'भक्तजनोंको सुख देगा', श्रीराधाकी इस चित्त-भूमिका स्मरण सीधे केशव-चरणोंमें पहुँचेगा। इस गीतको कविने वैष्णवोंके सान्निध्यमें गाया है। यहाँ 'केशव' पद वैष्णवोंका वाचक है। 'केशवः पदं = स्थानं यस्याऽसौ तं केशवपदम्' अर्थात् भगवान् जिनके द्वारा प्राप्य हैं, वे वैष्णव ही केशव पद-वाच्य हैं।