भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

चतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५५ बालबोधिनी—श्रीकृष्णका निरन्तर ध्यान करनेसे श्रीराधा एकात्मकताको प्राप्त हो गयीं। यही सूचित करती हुई सखी कहती है—हे माधव ! आप श्रीराधाके हृदयमें निरन्तर विद्यमान हैं। कामदेव अपने बाणोंको अजस्र रूपसे छोड़ रहा है। आपको कहीं कष्ट न हो जाये, इसलिए अपने हृदयके मर्मस्थलको जलकणोंके साथ बड़े-बड़े कमलदल-समूहसे आवृत कर रही हैं। वह आपकी रक्षाके लिए सारे उपायोंको कर रही हैं। उत्प्रेक्षा करते हुए कहती हैं कि नलिनदल-जालको उसने हृदयमें इसलिए आच्छादित किया है कि उसके हृदयसे आप कहीं निकल न जायें। कामदेवका तूणीर (तरकश) अक्षय है—एकके बाद दूसरा बाण फेंका जा रहा है। हे माधव ! तुम्हारे विरहमें वह निरुपाय होकर उपाय भी सोचती है तो क्या सोचती है? कमल-दल तो वैसे ही उसके बाण हैं और वह कवच कहाँसे होगा? उसे अपना कवच बनाकर अपना कष्ट और बढ़ा रही हैं॥२॥ कुसुम-विशिख-शर-तल्पमनल्प-विलास-कला-कमनीयम्। व्रतमिव तव परिरम्भ-सुखाय करोति कुसुम-शयनीयम् ॥ सा विरहे तव दीना... ॥३॥ अन्वय—[अपि च] अनल्प-विलासकला-कमनीयं (अनल्पाभिः बहुभिः विलास-कलाभिः विलासभावैः कमनीयं मनोज्ञं) कुसुम-शयनीयं (पुष्पशय्यां) [अपि] [तव विरहे] कुसुमविशिख- शरतल्पम् (कुसुम-विशिखस्य कामस्य शरतल्पं शरशय्याभूतं) तव परिरम्भसुखाय (गाढालिङ्गनसुख-लाभाय) व्रतमिव करोति [सुदुर्लभं तव परिरम्भणसुखम्, अतस्तल्लाभाय व्रतचर्यामिव करोतीत्यर्थः] ॥३॥

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक) · पृष्ठ 187, कुल 448 में से · BharatKosha