गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५५ बालबोधिनी—श्रीकृष्णका निरन्तर ध्यान करनेसे श्रीराधा एकात्मकताको प्राप्त हो गयीं। यही सूचित करती हुई सखी कहती है—हे माधव ! आप श्रीराधाके हृदयमें निरन्तर विद्यमान हैं। कामदेव अपने बाणोंको अजस्र रूपसे छोड़ रहा है। आपको कहीं कष्ट न हो जाये, इसलिए अपने हृदयके मर्मस्थलको जलकणोंके साथ बड़े-बड़े कमलदल-समूहसे आवृत कर रही हैं। वह आपकी रक्षाके लिए सारे उपायोंको कर रही हैं। उत्प्रेक्षा करते हुए कहती हैं कि नलिनदल-जालको उसने हृदयमें इसलिए आच्छादित किया है कि उसके हृदयसे आप कहीं निकल न जायें। कामदेवका तूणीर (तरकश) अक्षय है—एकके बाद दूसरा बाण फेंका जा रहा है। हे माधव ! तुम्हारे विरहमें वह निरुपाय होकर उपाय भी सोचती है तो क्या सोचती है? कमल-दल तो वैसे ही उसके बाण हैं और वह कवच कहाँसे होगा? उसे अपना कवच बनाकर अपना कष्ट और बढ़ा रही हैं॥२॥ कुसुम-विशिख-शर-तल्पमनल्प-विलास-कला-कमनीयम्। व्रतमिव तव परिरम्भ-सुखाय करोति कुसुम-शयनीयम् ॥ सा विरहे तव दीना... ॥३॥ अन्वय—[अपि च] अनल्प-विलासकला-कमनीयं (अनल्पाभिः बहुभिः विलास-कलाभिः विलासभावैः कमनीयं मनोज्ञं) कुसुम-शयनीयं (पुष्पशय्यां) [अपि] [तव विरहे] कुसुमविशिख- शरतल्पम् (कुसुम-विशिखस्य कामस्य शरतल्पं शरशय्याभूतं) तव परिरम्भसुखाय (गाढालिङ्गनसुख-लाभाय) व्रतमिव करोति [सुदुर्लभं तव परिरम्भणसुखम्, अतस्तल्लाभाय व्रतचर्यामिव करोतीत्यर्थः] ॥३॥