भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१५४ श्रीगीतगोविन्दम् वृक्षके सम्पर्कसे मलय-पवनको भी वह गरलवत् अनुभव करती हैं। मलयाचलके चन्दनवृक्षोंसे लिपटे हुए विषैले सर्पोंकी फुत्कारोंसे वायु दूषित हो गयी है। ‘मनसिज-विशिख-भयादिव’ में उत्प्रेक्षा अलङ्कारका सौष्ठव है, साथ ही इस श्लोकमें रूपक और विरोधादलङ्कारोंकी भी संसृष्टि है। अविरल-निपतित-मदन-शरादिव भवदवनाय विशालम्। स्वहृदय-मर्माणि वर्म करोति सजल-नलिनी-दल-जलम्॥ सा विरहे तव दीना...॥२॥ अन्वय-[किञ्च अतिस्निग्धायां तस्यां कथमिव त्वमेवं निष्ठुरो-ऽसीत्याह] - अविरल-निपतित-मदन-शरादिव (अविरलं निरन्तरं निपतितं) (पतनं, भावोक्त) यस्य तादृशस्य मदनस्य यः शरः तस्मादिव) भवदवनाय (भवतः हृदयस्थस्येति भावः अवनाय रक्षणाय) [तस्या हृदये भवान् तिष्ठति, हृदयञ्च कामो विध्यति, हृदयवेधनाद्भवतोऽपि वेधः स्यादित्याशङ्क्य भवद्रक्षणार्थमेवेति भावः] स्वहृदय-मर्म्मणि (निजहृदयरूपे मर्मस्थाने) विशालं (पृथुलं) सजल-नलिनी-दल-जालं (सजलनलिनीदलानां जालं समूहमेव) वर्म्म (कवचं) करोति॥२॥ अनुवाद-हृदय पर अनवरत गिरते हुए कामबाणोंसे अपने हृदयके भीतर विराजमान आपकी रक्षा करनेके लिए श्रीराधा विशाल सजल कमल-पत्र-समूहको अपने हृदयके मर्मस्थलका कवच बना रही हैं। पद्यानुवाद- मदन शरोंसे अपने प्रियकी रक्षामें बेहाल। उर पर बिछा रही है रह रह सजल कमलिनी-जाल॥ वह विरह विदग्धा दीना। माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना॥