गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः सर्गः—स्निग्धमधुसूदनः १५३ अनुवाद—हे माधव ! वह श्रीराधा आपके विरहमें कातर होकर मदन-बाणके वर्षणके भयसे भीत होकर उस मन्द-सन्तापकी शान्तिके लिए ध्यान-योगके द्वारा आपमें निमग्न होकर आपके शरणागत हुई हैं। आपसे विच्युत होकर वह चन्दनको विनिन्दित करती हैं, चन्द्र-किरणोंको देखकर उनकी देह दग्ध होने लगती है, मलय-समीरण भी उसके अङ्गोंमें सन्ताप बढ़ा रहा है। विषधर सर्पोंसे परिवेष्टित चन्दन वृक्षोंसे प्रवाहित फुत्कार-मिश्रित होनेके कारण मलय-समीरको भी गरल समान मान रही हैं। पद्यानुवाद— वह विरह विदग्धा दीना माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना। वह विरह विदग्धा दीना चन्दन और चन्द्र-किरणोंसे होती अधिक अधीर, अहिगण गरल समान विमूर्च्छित करना मलय समीर। वह विरह विदग्धा दीना माधव, मनसिज विशिख भयाकुल तुममें है तल्लीना। बालबोधिनी—सखी श्रीकृष्णके सन्निकट उनकी विरहवेदना सुनाती है। वह कहती है कि श्रीराधा अत्यन्त दुःखित हैं। कामबाणके त्राससे आपका ध्यान करती हुई आप ही में समाधिस्थ हो गयी हैं। बाणके भयसे जैसे प्राणी रक्षार्थ दूसरेकी शरणमें चला जाता है, उसी प्रकार वह आपके शरणापन्न हुई हैं; क्योंकि आप कामस्वरूप हैं, आपके प्रसन्न होनेपर किसीका भय नहीं रहता है। हे माधव ! आपके विरहमें श्रीराधाकी ऐसी स्थिति हो गई है कि अपने शरीरमें लगे हुए चन्दनकी निन्दा करती हैं, क्योंकि यह चन्दन उनके लिए आह्लादकारी नहीं अपितु प्रदाह रूप है। चन्द्र-किरणोंको देखकर भी उनका हृदय प्रज्वलित होने लगता है; क्योंकि चन्द्रिका भी उनकी कामाग्निको उद्दीपित कर रही है। चन्दन