गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ श्रीगीतगोविन्दम् उन्मत्त-उद्विग्न हो रहा था। अन्वेषण करने पर भी जब उनकी श्रीराधा नहीं मिलीं तो वे यमुना पुलिन पर विद्यमान वेतसी निकुञ्जमें निरुत्साहित और उदास होकर बैठ गये। गीतम् ८ कर्णाटरागैकतालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह आठवाँ प्रबन्ध कर्णाटराग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। जब शिखिकण्ठ—नीलकण्ठ महादेव एक हाथमें कृपाण और दूसरे हाथमें एक विशाल गजदन्त धारणकर दाहिने कन्धेमें रखकर चलते हैं, सुर-चारण आदि उनकी स्तुति करते हैं, ऐसे समयमें कर्णाट राग प्रस्तुत होता है। निन्दति चन्दनमिन्दु-किरणमनुविन्दति खेदमधीरम्। व्याल-निलय-मिलनेन गरलमिव कलयति मलय-समीरम् ॥ सा विरहे तव दीना। माधव मनसिज-विशिख-भयादिव भावनया त्वयि लीना ॥१॥ ध्रुवपदम् अन्वय—हे माधव, तव विरहे दीना (कातरा) सा (राधा) मनसिजविशिखभयादिव (मनसिजस्य कामस्य विशिखेभ्यः बाणेभ्यः भयादिव) भावनया (उद्वेगेन) त्वयि लीना (ध्यानेन लयप्राप्ता) [इव आस्ते इति शेषः, कामरूपे त्वयि प्रसन्ने तद्भयं न करिष्यतीत्यभिप्रायः]; [सा अधुना] चन्दनम् इन्दुकिरणं (चन्द्रमयुखं) निन्दति, [स्वभावशीतलो यन्मां दहतः तन्ममैव दुर्दैवमिति] अनु (पश्चात्) अधीरं [यथा तथा] खेदं (तापं) विन्दति (लभते); [तथा] मलय-समीरं व्याल निलयमिलनेन (व्यालानां सर्पाणां निलयः चन्दनतरुः तस्य मिलनेन) गरलमिव कलयति (सम्भावयति) [सर्पभुक्तोज्झितो वायुः विषमिलितत्वात् विषवत् उत्प्रेक्षते] ॥१ ॥