भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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चतुर्थः सर्गः स्निग्ध-मधुसूदनः यमुना-तीर-वानीर-निकुञ्जे मन्दमास्थितम्। प्राह-प्रेम-भरोद्भ्रान्तं माधवं राधिका-सखी ॥१॥ अन्वय—[अथ राधिकाविरहोत्कण्ठं श्रीकृष्णं] राधिकासखी (राधिकायाः काचित् सहचरी) प्रेमभरोद्भ्रान्तं (प्रेम्णां भरेण उद्भ्रान्तम् उन्मत्तं) [अतएव तदन्वेषणं विहाय] यमुनातीर-वानीर- निकुञ्जे (यमुनातीरे यत् वानीरनिकुञ्जं वेतसलता-कुञ्जं तस्मिन्) मन्दं (विषण्णं निरुद्यमं वा यथास्यात् तथा) आस्थितम् (उपविष्टं) माधवं प्राह (उवाच) ॥१॥ अनुवाद—यमुनाके तटपर स्थित वेतसीके निकुञ्जमें श्रीराधाप्रेममें विमुग्ध होकर विषण्ण (विषाद) चित्तसे बैठे हुए श्रीकृष्णसे श्रीराधाकी प्रिय सखी कहने लगी। पद्यानुवाद— यमुनातीरे वेतसकुञ्जे, बैठे हैं यदुवंशी राधाके चिन्तनमें अपनी भूले लकुटी-वंशी। इसी समय सम्मुख हो कोई छाया-सी आ डोली और सखीकी व्यथा-कथा सब धीरे-धीरे बोली॥ बालबोधिनी—अब दोनोंकी पृथक् कामावस्थाका निरूपण करके उन दोनोंका संयोजन करानेकी इच्छासे दूतीयोगका निरूपण करते हैं। श्रीराधिकाकी सखीने माधवसे कहा। पूर्वरागमें श्रीराधाने अपनी सखीसे श्रीकृष्ण-मिलनकी वासना अभिव्यक्त की थी। तब वह सखी श्रीराधाको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके पास गयी तो देखा, उनका चित्त श्रीराधा-विषयक प्रेमाधिक्यके कारण उद्भ्रान्त अर्थात्