भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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पञ्चम सर्गः आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः अहमिह निवसामि याहि राधा- मनुनय मद्वचनेन चानयेथाः। इति मधु-रिपुणा सखी नियुक्ता स्वयमिदमेत्य पुनर्जगाद राधाम् ॥१॥ अन्वय—अथ तदार्त्तिश्रवण-व्याकुलोऽपि स्वापराधचिन्तया निरतिशय-भीतः तत्कोपशिथिलीकरणाय श्रीहरिः सखीमेव प्रेषितवानित्याह—अहम् इह (अस्मिन् निर्जन प्रदेशे) निवसामि (तिष्ठामि); त्वं याहि (गच्छ); मम वचनेन राधाम् अनुनय (सान्त्वय) [यदि त्वया तन्मानोऽपनेतुं शक्यते तर्हि] इह आनयेथाश्च [सहसा मम गमनेन मानोऽतिगाढो भवेदित्यभिप्रायः] इति (इत्थं) मधुरिपुणा (कृष्णेण) नियुक्ता सखी स्वयम् एत्य (आगत्य) पुनः राधां जगाद ॥१॥ अनुवाद—राधा-सखीकी बात सुनकर श्रीकृष्ण बोले—मैं यहीं रहता हूँ, तुम श्रीराधाके पास जाओ और मेरे वचनोंके द्वारा उनको अनुनय-विनयके साथ मनाकर यहाँ ले आओ। इस प्रकार मधुरिपु कृष्णके द्वारा नियुक्त होकर वह सखी स्वयं श्रीराधाके पास आकर इस प्रकारसे कहने लगी। पद्यानुवाद— मैं बैठा हूँ यहीं और सखि! राधासे जा कहना— कब तक निठुर! और उत्पीड़न मुझको है यह सहना? बालबोधिनी—चतुर्थ-सर्गके प्रबन्धोंमें श्रीराधाकी विषम विरह-वेदनाका वर्णन हुआ है। सखीसे श्रीराधाकी विषम