गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८३ आर्त्ति सुनकर अपनी आपराधिक भावनासे बड़े लज्जित और भयभीत हुए तथा अपनी नित्य-प्रेयसी श्रीराधासे मिलनेके लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हुए, किन्तु स्वयं वहाँ नहीं गये, सखीसे अपना दुःख व्यक्तकर अनुनय-विनय आदिके द्वारा श्रीराधाके कोपको दूर करनेके लिए उसे भेजा। सखीसे कहा कि तुम मेरी ओरसे श्रीराधाजीसे प्रार्थना करना और उसे जैसे-तैसे प्रसन्न करके यहाँ ले आना। जब तक वे नहीं आती हैं, तब तक मैं यहीं प्रतीक्षा करूँगा—इसी यमुना तटपर रहता हूँ। इस आदेशको प्राप्तकर सखी श्रीराधासे कहने लगी— कृष्णके मनमें अपनी नित्य प्रेयसी श्रीराधाजीसे मिलनेकी आकांक्षा उत्पन्न हुई है, अतः इस सर्गको सकांक्ष-पुण्डरीकाक्ष कहा गया है। पुण्डरीकाक्ष—यह पद श्रीकृष्णके मनोज्ञतम नेत्रोंकी ओर भी पाठकोंका ध्यान आकृष्ट करता है। 'तस्य यथा पुण्डरीकमेवमेवाक्षिणी'—उपनिषदोंमें श्रीकृष्णके नेत्रोंको लाल कमलके समान माना है। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा वृत्त है। अथ दशमः सन्दर्भः गीतम् ॥१०॥ देशीवराडीरागेण रूपकतालेन गीयते ॥प्रबन्धः ॥ अनुवाद—यह प्रबन्ध देशीवराड़ी रागसे तथा रूपक तालसे गाया जाता है। बालबोधिनी—सुकेशी नायिका जब हाथोंमें कङ्कण, कानोंमें देवपुष्प लगाये हुए हाथमें चँवर लिये वीजन करती हुई निज दयितके साथ विनोदन करती है, तब देशीवराड़ी राग प्रस्तुत होता है।