भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

१८४ श्रीगीतगोविन्दम् वहति मलय-समीरे मदनमुपनिधाय, स्फुटति कुसुमनिकरे विरहि-हृदय-दलनाय सखि ! सीदति तव विरहे वनमाली ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—सखि, तव विरहे वनमाली [त्वत्-कर-कल्पित- वनमालाव build-up notes...]वनमालाव Multiplier...? No: वनमालाव rumble/lambanene: वनमालाव rumble? Let's check closely: वनमालाव rumble-> वनमालाव rumble... wait: वनमालाव rumble? No: वनमालाव rumble? No, it's वनमालाव rumble? No, let's read carefully: वनमालाव rumble? No: वनमालाव rumble? Let's read: वनमालाव rumble? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? No, let's zoom in on line 7: वनमालाव rumble? "वनमालाव rumble" -> "वनमालाव rumble"? No, "वनमालाव rumble"? "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" ? No, "वनमालाव rumble"? No: "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने": "वनमालाव rumble"? It says "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> "वनमालाव लम्बनने" -> look: "वनमालाव लम्बनेन जीवतीति वनमालि-शब्दोपन्यासः]". Let's check line 6-7: अन्वय—सखि, तव विरहे वनमाली [त्वत्-कर-कल्पित- वनमालाव लम्बनेन जीवतीति वनमालि-शब्दोपन्यासः] मदनम् उपनिधाय (उप समीपे-संस्थाप्य) मलय-समीरे बहति [सति], [तथा] कुसुमनिकरे कुसुम-समूहे) विरहि-हृदय-दलनाय (विरहिणां मर्मपीड़नाय) स्फुटति (विकसति) [सति] सीदति (अवसादं गच्छति; सन्तप्यते इत्यर्थः) ॥१॥ अनुवाद—सखि ! राधे ! राधे ! देखो, मदन-रसमें सिक्त करने हेतु मलयानल प्रवाहित हो रहा है, विरही जनोंके हृदयको विदीर्ण करने वाला विविध कुसुमसमूह प्रस्फुटित हो रहा है। ऐसे उस वसन्त समयमें श्रीकृष्ण सकाम होकर तुम्हारे विरहसे दुःखी हो रहे हैं। पद्यानुवाद— विवश बनाती मदन-लहरियाँ, मिलकर मलय समीरे चलदल-सा चल जाता जी जब, हँसती कलियाँ धीरे॥ तव विरहे वनमाली! पल पल आकुल आली। बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे सखि ! यह वसन्तकी बेला है, इसमें विरहीजनोंको मार्मिक पीड़ा पहुँचाने वाला मलय समीरण बह रहा है, कामके उद्दीपनके रूपमें हृदयविदारक कुसुम-समुदाय विकसित हो रहा है। तुम्हारे विरहमें कृष्ण अतिशय विषण्ण हैं, तुम चलो और उनसे मिल लो। वनमाली—तुम्हारे हाथकी बनी हुई वनमाला धारण कर किसी प्रकारसे जीवन धारण कर रहे हैं। इसी अभिप्रायसे श्रीकृष्णको वनमाली कहा गया है।

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक) · पृष्ठ 216, कुल 448 में से · BharatKosha