गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८५ दहति शिशिरमयूखे मरणमनुकरोति। पतति मदन-विशिखे विलपति विकलतरोऽति— सखि! सीदति तव विरहे... ॥२॥ अन्वय—शिशिरमयूखे (शीतरश्मौ चन्द्रे) दहति (दहनवत् किरणं वितरति सति) मरणम् अनुकरोति (मृतवन्निश्चेष्टो भवति; मूर्च्छतीति भावः) [तथा] मदनविशिखे (कामबाणे) पतति [सति] अतिविकलतरः [सन्] विलपति [कुसुमपतने हृदि विध्यत्कामबाणभ्रमात् आक्रोशतीत्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—वे चन्द्र-किरणोंसे संदग्ध होकर मुमूर्षु प्रायः हो रहे हैं। वृक्षोंसे मदन-शरके सदृश पुष्पोंके गिरनेसे उनका हृदय विद्ध हो गया है। ऐसी स्थितिमें वे अति विकल होकर विलाप कर रहे हैं। पद्यानुवाद— प्राण जलाने आती हैं नभसे चन्दाकी किरनें। मदन-शरोंसे व्याकुल होकर लगते उठने-गिरने॥ तव विरहे वनमाली पल-पल आकुल आली! बालबोधिनी—तुम्हारे विरहसे सन्तप्त वनमालीको चन्द्रमा शीतल नहीं करता, अपितु उन्हें प्रदाहका अनुभव होता है। इस चन्द्रसे ज्वाला निकल रही है, जो उन्हें जलाये जा रही है, मानो मृत्यु ही साक्षात् उपस्थित हुई है। मृतप्राय व्यक्ति जैसी चेष्टा करता है, उसी प्रकार वे भी चेष्टा करते हैं। वृक्षोंके पत्ते तथा फूलोंके गिरनेसे उनको ऐसा लगता है कि मानो कामदेव उनके हृदय पर बाण मार रहा हो। वे कुसुम-शय्या पर ऐसे पड़ जाते हैं, मानो बाणोंकी शय्या हो और अधिक विकल होकर बिलखने लगते हैं। ध्वनति मधुप-समूहे श्रवणमपिदधाति। मनसि कलित-विरहे निशि निशि रुजमुपयाति— सखि! सीदति तव विरहे... ॥२॥