गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—मधुपसमूहे (भ्रमरचये) ध्वनति (गुञ्जति सति) श्रवणम् (कर्णम्) अपिदधाति (आच्छादयति; उद्दीपनत्वेन असह्यत्वादिति भावः); [तथा] निशि निशि (प्रतिरात्रं) वलितविरहे (अत्युद्रिक्त-विरहे) मनसि रुजम् (पीड़ाम्) उपयाति (अधिकमाप्नोति)। [निशायाः तत्प्राप्तिकालत्वात् त्वदप्राप्त्या अलिध्वनिश्रवणात् पीड़ामनुभवतीत्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद—मधुकरोंकी गुञ्जारको सुनकर वे अपने कानोंको हाथोंसे ढक लेते हैं। प्रत्येक रात्रिमें तुमको पावेंगे सोचते हैं, किन्तु पाते नहीं; अतएव दिन-प्रतिदिन विरह-व्यथामें विजातीय यन्त्रणाको सहन करते हुए अधिकाधिक रुग्ण होते जा रहे हैं। पद्यानुवाद— मधुपोंकी 'गुनगुन' से मूँदे हैं कानोंको रहते। रात रात भर सुधि-पीड़ामें हैं आँखोंसे बहते ॥ तव विरहे वनमाली ! पल-पल आकुल आली ॥ बालबोधिनी—यद्यपि चहुँदिशि भौरोंकी झौर-की-झौर गुनगुना रही है, परन्तु अलियोंका गुञ्जन श्रीकृष्णको प्रसन्न नहीं कर रहा, अपितु कर्णकटु हो रहा है। अतएव हाथोंसे अपने कानोंको बन्द कर देते हैं। प्रत्येक रात्रिमें ऐसा मानते हैं कि आप उनके पास हैं, परन्तु आपको न पानेसे उनकी विरह-वेदना और बढ़ गयी है। हृदय विरहसे सराबोर हो गया है, इसलिए वे करवटें बदलते रहते हैं, छटपटाते रहते हैं। प्रस्तुत पद्यमें सखीके द्वारा विप्रलम्भके उद्दीपन विभावोंका वर्णन हुआ है। वसति विपिन-विताने त्यजति ललित-धाम। लुठति धरणि-शयने बहु विलपति तव नाम— सखि! सीदति तव विरहे... ॥४॥