भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८७ अन्वय—विपिनविताने (वनगहने) वसति; ललितधाम (रुचिरमपि गृहं) त्यजति [विरहवैकल्यात् एकत्र स्थित्यभावाद् वितान- शब्दोपादानम्]; धरनिशयने (भूशय्यायां) लुठति; तव नाम बहु (बारं बारं) विलपति (जपति; तव नामधेयादन्यत् तस्यमुखात् न निःसरतीत्यर्थः) ॥४॥ अनुवाद—वे अपने मनोहर शयन-मन्दिरका परित्याग करके अरण्यमें निवास करते हैं और भूमि-शय्या पर लुण्ठित होते हुए बार-बार राधे! राधे! तुम्हारे ही नामका उच्चारण करते हैं। पद्यानुवाद— कलित धाम परित्याग बसे हैं, वनमें तप-सा साधे दर्दसे धरती पर लेटे रटते राधे! राधे! तव विरहे वनमाली, पल पल आकुल आली। बालबोधिनी—सखी कह रही है—राधे! तुम्हारे वियोगमें श्रीकृष्णने अपने मनोहर धाममें रहना छोड़ दिया है। उन्हें जङ्गलोंके वितानमें रहना ही अच्छा लगने लगा है। शय्या पर न सोकर वे तुम्हारे विरहकी पीड़ासे भूमि पर ही सोते हुए लोट-लोट कर निशा-कालको व्यतीत करते हैं, बस तुम्हारा ही नाम करते हैं—राधे, हा राधे! भणति कवि-जयदेव इति विरह-विलसितेन। मनसि रभस-विभवे हरिरुदयतु सुकृतेन— सखि! सीदति तव विरहे... ॥५॥ अन्वय—कवि जयदेवे इति (एवं) भणति (गदति सति) विरहविलसितेन (विच्छेदविलासेन हेतुना) सुकृतेन (पुण्येन हरिः रभसविभवे (रभसस्य प्रेमोत्साहस्य विभवो यत्र तस्मिन्) [गायतां शृण्वताञ्च भक्तानां] मनसि (चित्ते) उदयतु [हरिविरहविलसितेन हेतुना यदुत्पन्नं सुकृतं तेन गायतां शृण्वताञ्च मनसि हरिरुदितो भवतु इति भावः] ॥५॥