गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्णकी विरह-व्यथासे पूर्ण इस गानसे जो सुकृति सञ्चित होती है, उस सुकृतिके फलस्वरूप जिन पाठकोंका मन विरहके विलासमें निरतिशय रूपसे निमग्न हो गया है, उनके हृदयमें श्रीकृष्ण सम्यक् रूपसे उदित हों। पद्यानुवाद— कवि जयदेव लीन हैं अतिशय हरिके विरह-विलासे। भाता है यह रस जिसको अति उसमें ज्ञान प्रकाशे॥ बालबोधिनी—कवि जयदेव कह रहे हैं कि उनके इस 'गरुडपदनाम' के दशम प्रबन्धके पाठकों एवं श्रोताओंको बहुत-सी सुकृति प्राप्त होगी, उन सुकृतियोंका मन श्रीहरिके विरहविलास जन्य उत्साहसे सम्पन्न होगा। रसोत्कण्ठित उन हृदयोंमें श्रीभगवान्का आविर्भाव हो। इस प्रबन्धको केदार रागमें गाया जाता है। श्रीराधाने जैसे ही निज प्राणकोटि निर्मञ्छनीय-चरण प्राणनाथ श्रीकृष्णके विरह-विलापका श्रवण किया, वैसे ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ी, तब सखीने बोलना बन्द कर दिया, आगे कुछ कह ही न सकी। इसीलिए यह गीति मात्र पाँच पदोंमें ही वर्णित है। पूर्वं यत्र समं त्वया रतिपतेरासादिताः सिद्धय- स्तस्मिन्नेव निकुञ्ज-मन्मथ-महातीर्थे पुनर्माधवः। ध्यायंस्त्वामनिशं जपन्नपि तवैवालाप-मन्त्रावलीं भूयस्त्वत्कुचकुम्भ-निर्भरपरीरम्भामृतं वाञ्छति ॥१॥ इति दशमः सन्दर्भः। अन्वय—पूर्वं यत्र त्वया समं (सह) रतिपतेः (मदनस्य) सिद्धयः (त्वया सह आश्लेषादिकाः) आसादिताः (प्राप्ताः) [माधवेनेति शेषः] तस्मिन्नेव निकुञ्ज-मन्मथ-महातीर्थे (निकुञ्जरूपे मन्मथ-केलिसिद्धिक्षेत्रे) [त्वमेव तस्यैष्टदेवतेति त्वत्साक्षात्कार-