गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८९ लाभाय] माधवः पुनः त्वाम् [प्राप्तुकाम एव] अनिशं (निरन्तरं) ध्यायन् [तथा] [मन्त्रजपस्तरेण इष्टदेवता नाचिरात् प्रत्यक्षभूता भवतीति] तवैव आलापमन्त्रावलीं (आलापरूपां मन्त्रसमूहम्) जपन् भूयः (प्रचुरं यथा तथा) त्वत्कुचकुम्भ निर्भरपरीरम्भामृतं (तव कुचकुम्भयोः निर्भरारालिङ्गनरूपममृतं) वाञ्छति ॥ १ ॥ अनुवाद—राधे ! माधवने पहले निकुञ्ज रूपी महातीर्थमें तुम्हारे आलिङ्गन आदि मनोरथोंकी सिद्धिके लिए मन्मथकी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उसी महातीर्थमें कामदेवकी सिद्धियोंके लिए सदैव तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम्हारे साथ किये गये वार्तालापवली-मन्त्रको जपते हुए तुम्हारे कुचकुम्भोंके गाढालिङ्गनरूपी अमृतमोक्षकी पुनः-पुनः अभिलाषा कर रहे हैं। बालबोधिनी—अतःपर सखी श्रीराधाकी मूर्च्छाका निवारण करनेके लिए कृष्ण-चरित्रका पुनः सिञ्चन करती हुई श्रीराधाका अभिसारिका नायिकाके रूपमें वर्णन करने लगी। वह श्रीराधाको यह कहकर प्रसन्न करना चाहती है कि माधवका मन उसमें ही अवस्थित है। राधे ! माधवने जिस निकुञ्ज रूपी मन्मथ-महातीर्थमें तुम्हारे साथ रहकर चुम्बन, आलिङ्गन आदि कामकी महासिद्धियोंको प्राप्त किया था, वे फिर आज उसी परिरम्भ-अमृतकी अभिलाषा कर रहे हैं। तुम्हारे कुचकुम्भका गाढालिङ्गन ही अमृत है, उस महातीर्थका जल-अमृत है। वे उसी कामदेवके महातीर्थमें रहकर तुम्हारे स्वरूपका ध्यान करते हुए तुम्हारे साथ हुए वार्तालापोंका मन्त्रावलीके रूपमें अहर्निश जप कर रहे हैं। देवताके सामने एकान्त ध्यान-जपके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होती है। अतः कृष्ण निकुञ्जरूपी कामतीर्थमें रतिपति अर्थात् आपके सम्मुख आपको ही उपलक्षित करके आपकी प्रसन्नता रूपी कामसिद्धिको प्राप्त करना चाहते हैं। इन्हीं निकुञ्जोंमें ही उन्हें कामकी सिद्धि प्राप्त हुई थी। कामकी सिद्धिके लिए