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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पञ्चमः सर्गः—साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १८९ लाभाय] माधवः पुनः त्वाम् [प्राप्तुकाम एव] अनिशं (निरन्तरं) ध्यायन् [तथा] [मन्त्रजपस्तरेण इष्टदेवता नाचिरात् प्रत्यक्षभूता भवतीति] तवैव आलापमन्त्रावलीं (आलापरूपां मन्त्रसमूहम्) जपन् भूयः (प्रचुरं यथा तथा) त्वत्कुचकुम्भ निर्भरपरीरम्भामृतं (तव कुचकुम्भयोः निर्भरारा‌लिङ्गनरूपममृतं) वाञ्छति ॥ १ ॥ अनुवाद—राधे ! माधवने पहले निकुञ्ज रूपी महातीर्थमें तुम्हारे आलिङ्गन आदि मनोरथोंकी सिद्धिके लिए मन्मथकी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उसी महातीर्थमें कामदेवकी सिद्धियोंके लिए सदैव तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम्हारे साथ किये गये वार्तालापवली-मन्त्रको जपते हुए तुम्हारे कुचकुम्भोंके गाढालिङ्गनरूपी अमृतमोक्षकी पुनः-पुनः अभिलाषा कर रहे हैं। बालबोधिनी—अतःपर सखी श्रीराधाकी मूर्च्छाका निवारण करनेके लिए कृष्ण-चरित्रका पुनः सिञ्चन करती हुई श्रीराधाका अभिसारिका नायिकाके रूपमें वर्णन करने लगी। वह श्रीराधाको यह कहकर प्रसन्न करना चाहती है कि माधवका मन उसमें ही अवस्थित है। राधे ! माधवने जिस निकुञ्ज रूपी मन्मथ-महातीर्थमें तुम्हारे साथ रहकर चुम्बन, आलिङ्गन आदि कामकी महासिद्धियोंको प्राप्त किया था, वे फिर आज उसी परिरम्भ-अमृतकी अभिलाषा कर रहे हैं। तुम्हारे कुचकुम्भका गाढालिङ्गन ही अमृत है, उस महातीर्थका जल-अमृत है। वे उसी कामदेवके महातीर्थमें रहकर तुम्हारे स्वरूपका ध्यान करते हुए तुम्हारे साथ हुए वार्तालापोंका मन्त्रावलीके रूपमें अहर्निश जप कर रहे हैं। देवताके सामने एकान्त ध्यान-जपके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होती है। अतः कृष्ण निकुञ्जरूपी कामतीर्थमें रतिपति अर्थात् आपके सम्मुख आपको ही उपलक्षित करके आपकी प्रसन्नता रूपी कामसिद्धिको प्राप्त करना चाहते हैं। इन्हीं निकुञ्जोंमें ही उन्हें कामकी सिद्धि प्राप्त हुई थी। कामकी सिद्धिके लिए

१९० श्रीगीतगोविन्दम् तुम्हारा वार्तालाप मन्त्र बन गया। तुम ही उस निकुञ्जकी देवता हो। मन्त्रजपके द्वारा तुम्हारे कुम्भके समान उन्नत उरोजोंका गाढ़ालिङ्गन रूपी अमृतको वे प्राप्त करना चाहते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, काव्यलिङ्ग अलङ्कार है। एकादश सन्दर्भः गीतम् ॥११॥ गुर्जरीरागेण एकतालीतालेन गीयते॥ अनुवाद—यह ग्यारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गया जाता है। रति-सुख-सारे गतमभिसारे मदन-मनोहरवेषम्। न कुरु नितम्बिनि! गमन-विलम्बनमनुसर तं हृदयेशम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली। गोपीपीनपयोधरमर्दनचञ्चलकरयुगशाली ॥१॥ध्रु. अन्वय—[अभिसाराय प्रार्थयते—अभिसारिका-लक्षणं यथा— “अभिसारयते कान्तं या मन्मथवशंवदा। स्वयं वाभिसरत्येषा धीरैरुक्ताऽभिसारिका॥” इति साहित्यदर्पणे।] हे नितम्बिनि (निविड़नितम्बवति) रतिसुख सारे (रतौ यत् सुखं तस्य सारः यत्र तादृशे) अभिसारे (सङ्केतस्थाने) गतं (प्राप्तमभिसृतमित्यर्थः) मदन-मनोहर-वेशं (मदनेन प्रेम्ना मनोहरो वेशो यस्य तादृशं) तं हृदयेशम् (प्राणवल्लभम्) अनुसर। गमनविलम्बनं न कुरु (गुरुनितम्बतया सहजगमन-वैलम्ब्यशङ्क्येदयुक्तम्); [त्वद्विरह- खिन्नस्य अनुसरणे विलम्बो न युक्तः]; वनमाली (श्रीकृष्णः) धीरसमीरे (धीरसमीराख्ये यद्वा धीरः मन्दः समीरः समीरणो यत्र तादृशे; अनेन सुखदत्वं निविड़त्वात् निर्जनत्वञ्चोक्तम्) यमुनातीरे वने वसति॥१॥

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९१ अनुवाद—सुमन्द मलय मारुत सेवित यमुना तीरवर्ती निकुञ्जवनमें बैठकर वनमालाधारी (श्रीकृष्ण) गोपियोंके पयोधरमण्डलको निपीडित करनेमें चञ्चलशाली कर-युगलसे सुशोभित हो प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! रतिसुखके सारभूत सङ्केतस्थानमें मदनके समान मनोहरवेशको धारण किये हुए हृदयवल्लभ श्रीकृष्णके पास अभिसरण करो, अब विलम्ब मत करो। पद्यानुवाद— "रति-सुख-सारे गत अभिसारे, मदन मनोहर वेशम्।" न कर नितम्बिनि! गमन विलम्बन, अनुसर निज हृदयेशम् ॥ धीर समीरे यमुना-तीरे, राज रहे वनमाली। गोपी-पीन-पयोधर-मर्दन-चञ्चलकर-युगशाली ॥ बालबोधिनी—अब सखी श्रीकृष्णके पास अभिसरण करानेके लिए श्रीराधाको प्रोत्साहित करती हुई कहती है—हे नितम्बिनि! अर्थात् प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! चलनेमें तुम अब देर मत करो, कालका अतिक्रमण मत करो, श्रोणीभारसे तुम वैसे ही धीरे-धीरे मन्द-मन्द चलती हो। उनके पीछे-पीछे तुम उस सङ्केतस्थानमें त्वरित पहुँचो। इस सङ्केत-स्थलमें रतिजन्य सुखकी प्रधानता है। वहीं तुम्हारे हृदयेश, वनमाली श्रीकृष्ण मदन मनोहर वेश धारण किये हुए अभिसारगामी हो रहे हैं, उत्सुकतापूर्वक तुम्हारी बाट जोह रहे हैं। सङ्केतस्थलका स्पष्ट निदर्शन हुआ है। यमुनाके तट पर वेतसीका वन है। हवा मन्द-मन्द चलते हुए कुछ-कुछ थिर-सी हो गयी है। यह मन्द समीरण रतिकालमें अति सुखदायी होता है, कानन तो अति निविड़-निर्जन है ही। श्रीकृष्णका वेश मदन-सेवाके अनुकूल है, अभिसारगामी हो रहे हैं। चाँदनी रातमें समयानुरूप वेषभूषा धारणकर अभिसरण करना अभिसार कहा जाता है। उस कुञ्ज-प्रदेशमें वनमालीके पास पहुँचनेमें अब किञ्चित् भी विलम्ब मत करो।

१९२ श्रीगीतगोविन्दम् नाम-समेतं कृत-सङ्केतं वादयते मृदुवेणुम्। बहु मनुतेऽतनु ते तनु-सङ्गतपवन-चलितमपि रेणुम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥२॥ अन्वय—नाम-समेतं (नाम्ना समेतं यथास्यादेवं) कृतसङ्केतं (कृतं सङ्केतः इङ्गितं यथा स्यात् तथा; अहमिह तिष्ठामि त्वमप्यत्रागच्छति नाम-समेत-कृतसङ्केतार्थः इति सर्वाङ्गसुन्दरी) मृदु (कोमलं यथा भवेदेवं) वेणुं वादयते; [किञ्च] ते (तव) तनुसङ्गत-पवन-चलितमपि (तनु-सङ्गतेन गात्रस्पृष्टेन पवनेन चलिमपि) रेणुं (रजः) ननु (निश्चये) बहु मनुते (अधिकं मन्यते) [धन्योऽयं रेणुः यतस्तस्याः शरीरस्पृष्ट-वायोः स्पर्शसुखमन्वभूत्, ममेदृशं भाग्यं नास्तीति बहुमानार्थः]॥२॥ अनुवाद—हे राधे ! तुम्हारे नामका सङ्केत करते हुए वे कोमल वेणु बजा रहे हैं। तुम्हारे शरीरको संप्रुक्त करके वायुके साथ आये हुए बहुत अधिक धूलि-कणोंके स्पर्शसे स्वयंको अति भाग्यशाली मानकर उनका सम्मान कर रहे हैं। पद्यानुवाद— नाम सहित सङ्केत ध्वनित कर-कोमल वेणु बजाते। तव तन चुम्बित पवन-रेणुसे डरको समुद सजाते॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीको स्पष्ट कर रही है कि यदि तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास न हो तो वहाँसे आती हुई श्रीकृष्णकी वंशीकी टेर सुन लो, तुम्हारा ही नाम लेकर वह तुम्हें मिलनका संकेत दे रही है। श्रीकृष्ण इसी प्रकारसे तुम्हें राह बता रहे हैं। यदि तुम्हें यह आशंका है कि वहाँ जाने पर प्रतारणा होगी, किसी अन्य रमणीके साथ उनका अभिसार होगा तो तुम्हारी शंका निर्मूल है क्योंकि बालूके उन कणोंको भी रत्न जानकर वे अति सम्मान कर रहे हैं जो तुम्हारे चरणोंके आघातसे हवाके साथ उनके पास पहुँचे हैं।

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९३ पतति पतत्रे विचलति पत्रे शङ्कित-भवदुपयानम्। रचयति शयनं सचकित-नयनं पश्यति तव पन्थानम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे...॥३॥ अन्वय—पतत्रे (विहङ्गमे) [वृक्षात् भूमौ] पतति (अवतरति सति) [तथा] पत्रे विचलति [सति] शङ्कित-भवदुपयानं (शङ्कितम् अनुमितं भवत्याः उपयानं आगमनं यस्मिन् तद् यथा तथा) शयनं (शय्यां) रचयति (निर्मिमीते) [तथा] सचकित-नयनं [यथा स्यात् तथा] तव पन्थानं (आगमनवर्त्म) पश्यति॥३॥ अनुवाद—राधे! श्रीकृष्ण अति उल्लास और अतिशय स्फूर्त्तिसे शय्याका निर्माण कर रहे हैं और जैसे ही किसी पक्षीके वृक्ष पर बैठनेसे पत्ते चंचल होकर थोड़ा-सा भी शब्द करने लगते हैं, तो वे तुम्हारे आगमनके मार्गका चकित दृष्टिसे अवलोकन करने लगते हैं। पद्यानुवाद— पक्षीके उड़नेसे तरुके पत्ते जब हिल जाते आती हो यह जान हृदयमें शंकासे खिल जाते। शीघ्र वहीं पर किसलय-दलकी शय्या ललित रचाते और पंथ पर चौंक-चौंक कर आँखें सजल बिछाते॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है कि वृक्षके पत्ते गिरनेसे या वायुके संचालनसे अथवा पक्षियोंके इधर-उधर घूमने-फिरनेसे सामान्य 'मर्मर' शब्द होते ही वे मनमें शंका करते हैं—कहीं श्रीराधा तो नहीं आ रही हैं। अतः बड़े ही उल्लाससे वे जल्दी ही शय्या-निर्माण करनेमें लग जाते हैं और चकित दृष्टिसे तुम्हारे आगमन-पथकी ओर देखने लगते हैं। मुखरमधीरं त्यज मञ्जीरं रिपुमिव केलिषु लोलम्। चल सखि! कुञ्जं सतिमिर-पुञ्जं शीलय नील-निचोलम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे...॥४॥

३. सर्ग ६-७: सोत्कण्ठवैकुण्ठ व विप्रलब्धा

१९४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे सखि, अधीरं (चञ्चलं) [अतएव] मुखरं (सशब्दं) मञ्जीरं (नूपुरं) केलिषु (क्रीड़ासु) लोलं (अतिचपलं); [अतः अभीष्टविरोधित्वात्] रिपुमिव (शत्रुवत्) त्यज; सतिमिरपुञ्जं (तमसावृतं) कुञ्जं चल; नीलनिचोलं (तामस्यभिसारिकोचितं नीलवसनं) शीलय (परिधेहि) ॥४॥ अनुवाद—सखि! चलो, कुंजकी ओर चलें। चलनेमें मुखरित होने वाले, विलास केलिमें अति चंचल होनेवाले इन नूपुरोंको तुम शत्रुके समान त्याग दो, तिमिर युक्त नीलवसनको धारण कर लो। पद्यानुवाद— त्याग मुखर नूपुर सखि! सत्वर साड़ी नीले रंगकी। पहिन, चलें इस तिमिर पुंजमें कुंज-ओर, क्यों ठिठकी? बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे राधे! इस समय अंधकार है जो अभिसारके लिए उचित समय है। इस अंधकारमें अभिसारिकाएँ अपने प्रेमियोंसे मिला करती हैं। अतः तुम इस अंधकारमें उस निभृत कुंजकी ओर चलो। सखि, इन नूपुरोंको उतार दो, ये तो तुम्हारे शत्रु ही हैं। अति चंचल होनेके कारण ये चलनेके समय तथा विलास-केलिमें ध्वनि उत्पन्न करते हैं, शत्रुके समान अवसरको जाने बिना ही मुखरित हो जाते हैं! ये मंजीर अभीष्ट सिद्धिके प्रतिकूल हैं। अब अपना नील वसन पहन लो। इस अभिसरणीय नील वसनके अवगुण्ठनसे तुम्हारा गौर वर्ण इस तिमिरमें एकाकार हो जायेगा, श्याममय हो जायेगा, तुम्हारे पथका अन्धकार और भी बढ़ जायेगा। उरसि मुरारेरुपहित-हारे घन इव तरल-बलाके। तड़िदिव पीते! रति-विपरीते राजसि सुकृत-विपाके॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥५॥

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९५ अन्वय—अयि पीते (गौराङ्गि) सुकृतविपाके (सुकृतानां पुण्यानां विपाके फलस्वरूपे) रति विपरीते (विपरीतरतौ) उपहितहारे (आन्दालित-हारे) मुरारेः (कृष्णस्य) उरसि (वक्षसि) तरल-वलाके तरला चञ्चला वलाका वकपङ्क्तिः यस्मिन् तादृशे) घने (मेघे) तड़ित् (सौदामिनी) इव राजसि (वर्त्तमान- सामीप्ये लट् शोभिष्यसे) [अत्र उरसो घनेन, हारस्य वलाकया, गौर्यास्तड़िता सह साम्यमवगन्तव्यम्] ॥५॥ अनुवाद—हे विद्युतके समान पीतवर्णमयी राधे ! अपने कृतपुण्यके परिणामस्वरूप विपरीत रतिमें श्रीकृष्णके मणिमय हारसे सुशोभित वक्षःस्थलके ऊपर ऐसे सुशोभित होओगी, जैसे मेघके ऊपर चंचल बक-पंक्ति प्रकाशित हो रही है। पद्यानुवाद— रति-विपरीते, पीते ! राजित घन पर बिज्जु शलाका। हरि-उर-उपहित मौक्तिक माला, होगी तरल बलाका ॥ विगलित-वसनं परिहृत-रसनं घटय जघनमपिधानं। किशलय-शयने पङ्कज-नयने निधिमिव हर्ष-निधानं ॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥६॥ अन्वय—[अतो गत्वा] हे पङ्कज-नयने (सरोजाक्षि) किशलय-शयने (वालपल्लवशय्यायां) विगलित-वसनं (श्रीकृष्णेन हेतुना विगलितं वसनं यस्मात् तादृशं) परिहृत-वसनं (तेनैव परिहृता दूरीकृता रसना काञ्ची यस्मात् तादृशं) [अतएव] अपिधानं (नास्ति पिधानम् आच्छादनं यस्य तत् आवरणरहितमित्यर्थः) जघनं (कटिपुरोभागं) [तस्यैव] निधिमिव (रत्नमिव) हर्षनिधानं (आनन्दनिकेतनं) घटय (कुरु) [गतावरणस्य निधेर्दर्शने हर्षो जायत एवेत्यर्थः] ॥६॥ अनुवाद—हे इन्दीवरनयन राधे ! नवीन किसलयकी शय्या पर तुम आवरणरहित होकर, करधनी रहित होकर प्रियतमके प्रीतिविधान स्वरूप अपने निधि-रत्न जंघाओंको स्थापित कर दो।

१९६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— पंकजनेयने! दल-शय्या पर अपने जीवन-धनसे। बाह्य आवरण त्याग न मिलती कैसे प्रमुदित मनसे ॥ बालबोधिनी—इसके पहलेके पद्यमें सखीने श्रीराधामें विपरीत रतिकी उत्कण्ठा जाग्रत की। अब श्रीकृष्णके द्वारा की जानेवाली रतिक्रीड़ाके प्रति श्रीराधाकी उत्कण्ठा उत्पन्न करती हुई सखी आगे कह रही है—हे पंकजके समान मनोहर नेत्रोंवाली राधे ! कोटिकन्दर्प अभिराम श्रीकृष्णकी सुन्दरताको देखकर वस्त्र तो तुम्हारी जाँघोंसे स्वयं ही खिसक जायेगा, मेखलामें संलग्न क्षुद्र घंटिकाएँ भी परिहृत हो जाएँगी, तुम आनन्दके निधान श्रीकृष्णके सुखका विधान करनेवाली इस निधिरत्न जंघा-भागको श्रीकृष्ण द्वारा रचित नवपल्लवोंकी शय्या पर रखना। हरिरभिमानी रजनिरिदानीमियमपि याति विरामम्। कुरु मम वचनं सत्वर-रचनं पूरय मधुरिपुकामम्— धीर समीरे यमुना तीरे... ॥७॥ अन्वय—हरिः (श्रीकृष्णः) अभिमानी (अतिशयेन त्वां मानयितुं शीलं यस्य तादृशः, त्वदेकपर इत्यर्थः); इयं रजनिः (रात्रिः) अपि विरामं (अवसानं) याति (तस्मात्) मम वचनं सत्वर-रचनं (सत्वरा रचना अनुष्ठानं यस्य तादृशं), अथवा सत्वरा रचना वेश परिपाटी यत्र तद् यथा तथा कुरु); मधुरिपु-कामं (मधुरिपोः हरेः कामं मनोरथं पूरय) ॥७॥ अनुवाद—इस समय श्रीकृष्ण अभिमानी हो रहे हैं, रात्रिका अवसान भी हो रहा है, अतएव मेरी बातोंको स्वीकार करो और अविलम्ब चलकर मधुरिपु श्रीकृष्णकी कामनाएँ पूर्ण करो।

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९७ पद्यानुवाद— रैन सिरानी, पिय अभिमानी कर न सजनि! अब देरी। जाकर उनसे सत्वर मिल ले—इतनी अनुनय मेरी॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—श्रीकृष्ण बड़े मनस्वी हैं, लाक्षणिक अर्थ यह है कि श्रीकृष्ण अन्यमनस्क हो रहे हैं, तुम्हें मनानेके लिए अत्यन्त प्रयत्नशील हैं, तुम दूसरेके साथ उनके अभिसारकी चिन्ता मत करो। मनस्वीके संदर्भमें यह कथनीय है कि वे अपने स्वाभिमानकी सुरक्षाके लिए तुम्हारे पास तक नहीं आ सके, कहीं वे तुम्हारा त्याग न कर दें—'हरिरभिमानी, त्वत्तो लाघवं न सहते, पश्चात्त्वा त्यक्षति'। जो कार्य तुम्हें बादमें करना है, उसे अभी क्यों नहीं कर लेतीं? रात बीतती जा रही है। अभिसरणीय बेला समाप्त हो रही है। मेरी बात मानो, तुम श्रीकृष्णके पास सत्वर ही चलो और उनकी अभिलाषाएँ पूर्ण करो। श्रीजयदेवे कृत-हरि-सेवे भणति परमरमणीयम्। प्रमुदित-हृदयं हरिमितिसदयं नमत सुकृत-कमनीयम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥८॥ अन्वय—कृत-हरि-सेवे (कृत्वा हरिसेवा येन तस्मिन्) श्रीजयदेव भणति [सति] [भोः साधवः] प्रमुदितः-हृदयं (प्रमुदितं हृदयं यथा तथा अथवा सदानन्द-चेतसं हरिम्) अतिसदयं (परमकृपालुं) परमरमणीयं (एकान्तमनोहरं) सुकृतकमनीयं (सुकृतेन शोभन-चरितेन कमनीयं; सर्वैर्विशेषेण वाञ्छनीयमित्यर्थः) हरिं [यूयं] नमत॥८॥ अनुवाद—हे साधुजन! परम मनोहर काव्य-रचयिता, श्रीहरि-सेवी जयदेवकृत इस गीतिसे प्रमुदित हृदय, अतिशय सदय, परम मधुर, शोभन-चरित तथा कमनीय गुणोंसे युक्त श्रीकृष्णको प्रमुदित हृदयसे नमस्कार करो।

१९८ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— श्रीजयदेव कथित यह वाणी, हरि-राधा-रस सानी। मुदित हृदय उसका करती है, जिसने ध्वनि पहचानी॥ बालबोधिनी—इस अष्टपदीके अन्तमें कवि जयदेव कहते हैं कि हे भागवतजन ! श्रीकृष्णकी सेवामें सदैव तत्पर रहने वाले उन्होंने सुमधुर इस कथा-काव्यकी रचना की है। अतः श्रीकृष्ण उन पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। अपनी-अपनी स्फूर्तिके कारण जो सबकी कामनाके विषय बने हुए हैं, ऐसे दयाके सिन्धु, परम रमणीय श्रीकृष्णको आप सभी प्रमुदित हृदयसे नमस्कार करें। विकिरति मुहुः कुश्वासानाशाः पुरो मुहुरीक्षते प्रविशति मुहुः कुञ्जं गुञ्जन्महुर्बहु ताम्यति। रचयति मुहुः शय्यां पर्याकुलं महुरीक्षते मदन-कदन-क्लान्तः कान्ते ! प्रियस्तव वर्तते ॥१॥ अन्वय—[अतिशीघ्रमभिसारयितुं प्रियतमदुःखं वर्णयति]—हे कान्ते (चार्वङ्गि) तव प्रियः (कृष्णः) [प्रिया मे नागता इति मत्वा] मुहुः (बारंबारं) श्वासान् (निश्वासान् विरहजनितान् आयातीति सम्भाव्य] पुरः (अग्रतः) मुहुः आशाः (दिशः) ईक्षते (आलोकयति); [कदाचित् अन्येन पथा आगतेति मत्वा] मुहुः कुञ्जं प्रविशति; [तत्रापि त्वामपश्यन् कथं नागतेति] मुहुः (पुनःपुनः) गुञ्जन् (कथं नागता, किंवा पथि काचित् दुर्घटना जातेत्यादि अव्यक्तं वदन्) बहु (अत्यन्तं) ताम्यति (ग्लायति); [मयि बद्ध-दृढानुरागा सा साम्प्रतमेवा- गमिष्यतीति] मुहुः शय्यां रचयति; [मच्चित्त-जिज्ञासार्थं कदाचित् इतो निर्गता तिष्ठतीति मत्वा] मुहुश्च पर्याकुलं (परितः आकुलं यथा तथा) ईक्षते (पश्यति) [इत्थं] मदन-कदन-क्लान्तः (मदनस्य कदनेन पीडनेन क्लान्तः कातरः सन्) वर्त्तते ॥१॥

पञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९९ अनुवाद - हे कामिनि ! तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण मदन-यन्त्रणासे सन्तप्त होकर निकुंज-गृहमें तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए चकित नेत्रोंसे चहुँदिशि देखते हैं। बार-बार अस्फुट शब्दोंसे विलाप करते हुए लताकुंजसे बाहर आते हैं और पुनः उसमें प्रवेश करते हैं एवं दुःखी होते हैं। बार-बार शय्याका निर्माण करते हैं और आकुल होकर बार-बार तुम्हारा आगमन-पथ देखते हैं। पद्यानुवाद- तेरे आनेकी आशा जब लगती पल पल घटने। तभी विकलता बढ़ जाती है, लगता धीरज हटने ॥ कभी प्रतीक्षा-दृगसे लखते और उसासें भरते। होकर भ्रान्त कुंजमें जाते फिर आँखोंसे ढरते ॥ बार-बार शय्या रचते हैं, खूब साधना साधे। मदन-कदन-परिक्लान्त कान्त हैं तेरे री सखि ! राधे ॥ बालबोधिनी - इस प्रबन्धकी उपसंहृति करते हुए कवि कहते हैं कि सखी श्रीराधाको श्रीकृष्णके सन्निकट पहुँचनेके लिए अनेक प्रकारसे प्रेरित कर रही है कि श्रीकृष्ण तुम्हारे विरहमें कामजन्य कष्टसे दुःखी हैं। तुम अभी तक आयी नहीं हो - ऐसा सोचकर बार-बार साँस लेते हैं, दीर्घ-निःश्वासधारा छोड़ते हैं। तुम अभी तक उनके पास पहुँची नहीं हो-प्रतीक्षारत होकर बार-बार चारों दिशाओंमें देखते हैं। तुम किस दिशासे आ रही हो, यह देखनेके लिए लताकुंजसे बाहर आते हैं। पुनः लताकुंजमें प्रवेश करते हैं, यह समझकर कि तुम कहीं आकर वहाँ छिप तो नहीं गयी हो? कभी बाहर, कभी अन्दर, बार-बार क्यों ऐसा करते हैं? इसलिए कि 'वह आ तो नहीं रही हैं, वह क्यों नहीं आयीं, किस कारणसे रुक गयीं अथवा कहीं डर तो नहीं गयीं'- इस प्रकारसे उसके अनागमनके कारणका विचार करके बार-बार बहुत प्रकारसे अव्यक्त शब्द करते हैं। पुनः

२०० श्रीगीतगोविन्दम् यह सब सोच-विचारना व्यर्थ है—वह अवश्य ही आयेंगी—ऐसा निश्चय कर शय्याकी रचना करना प्रारम्भ कर देते हैं। ‘कदन’ शब्दसे तात्पर्य है—मुझसे अनुराग होनेके कारण अवश्य ही आयेंगी। अतः उत्कण्ठित होकर बार-बार देखते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा ‘दीपक’ अलंकार है। त्वद्वाम्येन समं समग्रमधुना तिग्मांशुदस्तं गतो गोविन्दस्य मनोरथेन च समं प्राप्तं तमःसान्द्रताम्। कोकानां करुणस्वनेन सदृशी दीर्घा मदभ्यर्थना तन्मुग्धे! विफलं विलम्बनमसौ रम्योऽभिसार-क्षणः ॥२॥ अन्वय—[अतः सम्प्रत्येव गमनं साम्प्रतमिति समयानुकूल्य- माह]—अधुना त्वद्वाम्येन (तव प्रतिकूलतया अभिमान-वशात् मौनभावेन इति भावः) समं (सह) तिग्मांशुः (सूर्यः) समग्रं (सम्पूर्णं यथा तथा) अस्तं गतः गोविन्दस्य मनोरथेन च समं तमः (तिमिरं) सान्द्रतां (निविड़तां) प्राप्तम् [त्वयि गोविन्दस्य अनुरागः यथा क्रमशः गाढ़तां गतः तद्वदन्धकारोऽपि क्रमशः निविड़ः सञ्जात इत्यर्थः) मदभ्यर्थना (मम अभ्यर्थना अनुरोधश्च) कोकानां (चन्द्रकाराणां) करुणस्वरेन (कातरविलापेन) [रात्रौ तेषां विच्छेदादिति भावः]; तत् (तस्मात्) अयि मुग्धे, विलम्बनं विफलम्; [यतः] असौ अभिसारक्षणः (कान्ताभिगमन- कालः) रम्यः (प्रीतिप्रदः) [प्रियतमः उत्कण्ठितः रम्यश्च अभिसारक्षणः, चिरमभ्यर्थनपरा सखी, तथापि वेशादिव्याजेन गमनविलम्बनमिति मौग्ध्यम्] ॥२ ॥ अनुवाद—हे मुग्धे! तुम्हारी वामता (प्रतिकूलता) के साथ-साथ यह दिवाकर भी सम्पूर्ण रूपसे अस्त हो गया। श्रीकृष्णके मनोरथके साथ ही अन्धकार सान्द्रता (घनत्व) को प्राप्त हो गया। विरह-विकल चक्रवाक पक्षीके रात्रिकालमें करुण स्वर निरन्तर विलापके समान मेरी अभ्यर्थना भी

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०१ व्यर्थ हो गयी। मैं अति दीर्घकालसे करुण प्रार्थना कर रही हूँ। अब विलम्ब करना व्यर्थ है। अभिसारकी रमणीय बेला उपस्थित है। बालबोधिनी—हे राधे, हे मुग्धे! यह प्रियतमके समीप जानेका उपयुक्त समय है। अपने वाम स्वभावके अधीन होकर तुम मान करके बैठी ही रहीं, अब तो मान समाप्त हो गया है और इधर सूर्य भी अस्त हो गया। तुम्हारे रति-अभिसरणमें अब कोई बाधा नहीं है। गोविन्दके मनमें तुम्हारे प्यारके जो मनोरथ उठे थे, उनके साथ-साथ अन्धकार भी और गहरा हो उठा, मिलनकी आशा और तीव्र हो उठी। रात्रिकालमें चकवा-चकवी दोनों एक-दूसरेसे अलग-अलग होकर विरहाधिक्यके कारण दीर्घ करुण क्रन्दन करने लगते हैं। उसी दीर्घ पुकारके समान तुम्हारे समक्ष श्रीकृष्ण-मिलनके लिए की गयी मेरी अभ्यर्थना व्यर्थ ही चली गयी। हे मुग्धे, अब समय व्यर्थ मत गँवाओ, अभिसारका विशेष समय होता है, घना अन्धकार है, प्रियतम तुम्हारे लिए उत्कण्ठित हैं, तुम वेश-भूषादिके बहाने आगमनमें अब विलम्ब मत करो, जल्दी करो। प्रस्तुत श्लोकमें सहोक्ति अलंकार है तथा शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। आश्लेषादनु चुम्बनादनु नखोल्लेखादनु स्वान्तज- प्रोद्बोधादनु सम्भ्रमादनु रतारम्भादनु प्रीतयोः। अन्यार्थं गतयोर्भ्रमान्मिलितयोः सम्भाषणैर्जानतो- र्दम्पत्योरिह को न को न तमसि व्रीड़ाविमिश्रो रसः ॥३॥ अन्वय—[अथ उत्कण्ठावर्द्धनाय सुरतप्रीतेरत्याधिक्यं दर्शयति] —अन्यार्थं (अन्योन्यसङ्गलाभाय कार्यान्तरमुपलक्ष्य) गतयोः (सङ्केतस्थानं प्राप्तयोः) भ्रमात् (अन्वेषणाय भ्रमणात्) इह (ईदृशे सान्द्रे) तमसि (गाढ़ान्धकारे) मिलितयोः (सङ्गतयोः) सम्भाषणैः (कण्ठध्वनिभिः) जानतोः (केयं कश्चायमिति

२०२ श्रीगीतगोविन्दम् विन्दतोः) दम्पत्योः (स्त्रीपुंसयोः) [यथाक्रमं] आश्लेषात् (आलिङ्गनात्) अनु (पश्चात्), चुम्बनात् अनु, नखोल्लेखात् (नखानाम् उल्लेखात् आघातात्) अनु, स्वान्तजप्रोद्बोधात् (स्वान्तजस्य कामस्य प्रोद्बोधात् प्रकाशनात्), अनु, सम्भ्रमात् (साध्वसात्) अनु, रतारम्भात् (शृङ्गारारम्भणात्) अनु, प्रीतयोः (परितोषं गतयोः) कः कः व्रीड़ाविमिश्रः (व्रीड़या, कथं सहसैवं कर्त्तुमारब्धमित्येवं लज्जया विमिश्रः संवलितः) रसः (सम्भोगाद्यास्वादः) न [भवति] न [अपितु सर्वत्रैव सलज्जः रसास्वादः भवत्येव इत्यर्थः]। [एतेन अभिसर्त्तुं श्रीराधिका- प्रोत्साहनमुक्तम्] ॥३॥ अनुवाद—इस निविड़ तिमिरमें नायक-नायिका एक-दूसरेको प्राप्त करने हेतु अन्वेषणके लिए भ्रमण करते हुए अन्य नायक तथा नायिकाके भ्रमसे मिले हुए सम्भाषण द्वारा एक दूसरेको पहचान लेने पर परस्पर आलिङ्गन, पश्चात् चुम्बन, उसके बाद नख-क्षत अर्पण, पश्चात् कामोद्रेक होने पर मदनके आवेशमें सम्भ्रमके साथ रतिकेलिका प्रारम्भ होने पर सुरतक्रीड़ाके पश्चात् दोनों एक चमत्कारपूर्ण प्रीतिका अनुभव करोगे। इस अन्धकारमें व्रीड़ामिश्रित कौन-सा रस प्राप्त नहीं होगा? अतएव हे सुन्दरि ! चलो, शीघ्रातिशीघ्र केलि-कुंजमें चलें, भला ऐसे सुअवसरका क्या कभी त्याग किया जाता है? बालबोधिनी—सखी श्रीराधाको प्रलोभन दे रही है कि हे सखी राधिके ! वहाँ श्रीकृष्णके समीप पहुँचने पर तुम्हें अनेक प्रकारका केलि-कौतुक प्राप्त होगा—इस कथनसे सखी श्रीराधाकी उत्कण्ठा बढ़ाकर उन दोनोंके मनोरथका अभिव्यञ्जन कर रही है। अन्धकार हो जाने पर नायक अन्य नायिकाको तथा नायिका अन्य नायकको प्राप्त करनेके लिए यदि निकले हों और जब वे परस्पर मिलित हो जाएँ, तब जिस व्रीड़ा मिश्रित शृङ्गार रसकी अनुभूति होती है। तब ऐसा कौन-सा

पञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०३ रस है, जिसे प्राप्त करना अवशिष्ट रह जाय। उस व्रीड़ा-मिश्रित रसमें सब प्रकारके रसोंका समागम हो जाता है। भ्रमात् से तात्पर्य है—कुंजकी ओर भ्रमण करते हुए परस्पर मिल गये हों, अन्धकारमें परस्पर वार्तालापसे पहचान लिये गये हों अथवा अन्य किसी प्रयोजनसे गये हों और मिल गये हों। वार्तालाप होनेसे सात्विक भावके द्वारा स्वर-भंगसे पहचान लिये गये हों। मिलनके साथ ही वे सहसा आलिंगन करते हैं, किन्तु दोनोंको भय रहता है कि कहीं किसीने देख न लिया हो। अतः 'भयानक रस' प्रादुर्भूत होता है, जिसका 'भय' स्थायी भाव है। कान्ताके बार-बार मना किये जाने पर भी नायक अपनी हठवृत्तिके कारण उसका चुम्बन करता है, दन्तक्षत करता है। पर पुनः उसे शोक होता है—मैंने व्यर्थ ही इसे कष्ट पहुँचाया, लाख मना करने पर भी माना नहीं। अतः करुणासे उनका अन्तःकरण विगलित होता है। अतः यहाँ 'करुण रस' प्राप्त होता है। कामको प्रोत्साहित करनेके लिए परस्पर नखोल्लेख करते हैं, जिसका स्थायी भाव है 'उत्साह'। तत्पश्चात् परस्पर दोनों एक दूसरेके साथ रतिक्रीड़ाके लिए तत्पर होते हैं। इस क्रीड़ामें उन्हें विस्मय-प्रधान अद्भुत रसकी सुखानुभूति होती है। तत्पश्चात् कामोद्बोध होने पर नाना विलासोंसे विलसित हो परस्पर हास्य प्रधान बातें करते हैं और तब रतिक्रीड़ामें लिप्त होने पर दोनोंको हास्य रस अनुभूत होता है। सुरत-क्रीड़ा सम्पन्न होनेपर जब वे परस्पर आनन्दका अनुभव करते हैं, तब उन्हें सकल-रस-चक्रवर्ती रसराज शृङ्गार रसकी मधुरानुभूति होती है। इस प्रकार तिमिरमें मिलित पहले अनजान, फिर परस्पर पहचान लिये जानेपर दोनोंको लज्जा होती है, परन्तु परस्पर दोषारोपण अथवा क्रोध नहीं करते, क्योंकि दोनोंका समान दोष होता

२०४ श्रीगीतगोविन्दम् है। अतःपर नायक-नायिकाओंको अन्धकारमें लज्जामिश्रित सम्पूर्ण रसोंका अनुभव होता है। राधे! तुम्हें ऐसी प्रतीति होगी कि अहो! इतने दिनोंके पश्चात् जब हम दोनों मिले, तब इतने गहरे शृङ्गार रसमें क्यों डूबे? प्रस्तुत सन्दर्भमें चौर्यरतके सम्पूर्ण क्रमको भी बतलाया गया है। भरतमुनिने कहा है- आश्लेषचुम्बननखक्षतकामबोधशीघ्रत्वमैथुनमनन्तसुखप्रबोधम् । प्रीतिस्ततोऽपि रसभावनमेव कार्यमेवं नितान्तनतुराः सुचिरं रमन्ते ॥ प्रस्तुत श्लोकमें दीपक, समुच्चय तथा भ्रान्तिमान अलङ्कार द्रष्टव्य हैं। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। सभय-चकितं विन्यस्यन्तीं दृशौ तिमिरे पथि प्रतितरु मुहुः स्थित्वा मन्दं पदानि वितन्वतीम्। कथमपि रहःप्राप्तामङ्गैरनङ्ग-तरङ्गिभिः सुमुखि! सुभगः पश्यन् स त्वामुपैतु कृतार्थताम् ॥४ ॥ अन्वय-[अथैतच्छ्रवणव्यग्रतया गमनाय उद्यतामवलोक्य गमनप्रकार-माह]-अयि सुमुखि (सुवदने) सुभगः (भाग्यवान्; तव प्रणय- सौभाग्यशालीति यावत्) [हरिः] तिमिरे (तमसावृते इत्यर्थः) पथि (वर्त्मनि) प्रतितरु (प्रतिवृक्षे) सभयचकितं [यथा तथा; कुत्रचित् तिष्ठता केनचित् द्रक्ष्येऽहमिति नेत्रस्य सभयचकितत्वम्) दृशं (नेत्रं) विन्यस्यन्तीं (निक्षिपन्तीं) मुहुः (पुनः पुनः) स्थित्वा (ससाध्वसं विश्रम्य) मन्दं [यथा तथा] पदानि वितन्वर्तीं (विक्षिपन्तीं) [दौर्बल्यात् शीघ्रगमनाशक्त्या पदयोः मन्द-मन्द- विन्यासत्वम्] [अतः] कथमपि (अतिक्लशेन) रहःप्राप्तां (एकान्ते उपस्थितां) अनङ्ग-तरङ्गिभिः (कामतरङ्गपूर्णैः, उत्कण्ठया अनङ्ग-तरङ्गितवसङ्गनानाम्) अङ्गैः [उपलक्षितां] त्वां पश्यन् कृतार्थतां (साफल्यं) उपैतु (प्राप्नोतु; कृतार्थो भवतु इत्यर्थः) ॥४॥

पञ्चमः सर्गः - आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०५ अनुवाद-हे शोभने! तिमिरमय पथपर भय और चकित दृष्टिसे देखती हुई, तरुवरोंके समीप खड़ी होकर पुनः शनैः-शनैः पग बढ़ाती हुई, किसी प्रकार एकान्तमें पहुँची हुई, कामकी तरंगोंसे कल्लोलित होती हुई तुम्हें देखकर सौभाग्यवान श्रीकृष्ण कृतकृत्य होंगे। बालबोधिनी-तुम्हारी प्राप्ति ही श्रीकृष्णका सर्वस्व है, इसका दिग्दर्शन करते हुए सखी श्रीराधासे कह रही है-हे अतिशय सुन्दरि ! जब तुम यहाँसे चलने लगोगी, तब तुम्हारा मार्ग अन्धकारसे परिपूर्ण होगा। उस अन्धेरे पथपर चलते हुए भयभीत होकर चकित-सी तुम आगे पैर बढ़ाओगी। अन्धकारमें भयका होना तो स्वाभाविक ही है, कहीं कोई देख न ले, अतः चकित होना भी सहज ही है। ऐसे निविड़ अन्धकारमें मैं श्रीकृष्णसे मिलनेके संकेत-स्थानपर जा रही हूँ-ऐसा विस्मय तो होगा ही, जाने पर श्रीकृष्णसे मिलन होगा या नहीं-यह शंका भी होगी। स्तन एवं नितम्ब भारसे तुम्हारा शरीर शीघ्र ही अतिशय क्लान्त हो जाता है, अतः शीघ्र जानेमें असमर्थ अलसायी-सी तुम प्रत्येक वृक्षके नीचे ठहर-ठहर कर चलना। अनङ्गकी लहरें तुम्हारे शरीर पर क्रीड़ा कर रही हैं, इस शिथिलतासे उपलक्षित संकेत स्थानपर तुम्हें देखकर शुभग श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो जाएँगे। वे प्रसन्नताके अतिशय आवेगमें अवगाहन करने लगेंगे। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा अतिशयोक्ति नामक अलंकार है। राधा-मुग्ध-मुखारविन्द-मधुपस्त्रैलोक्य-मौलि-स्थली नेपथ्योचित-नील-रत्नमवनी-भारावतारान्तकः । स्वच्छन्दं व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष प्रदोषोदयः कंस-ध्वंसन-धूमकेतुरवतु त्वां देवकी-नन्दनः ॥५ ॥

२०६ श्रीगीतगोविन्दम् इति श्रीगीतगोविन्दे अष्टमः सन्दर्भः इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्येऽभिसारिका वर्णने साकाङ्क्षो नाम पञ्चमः सर्गः। अन्वय—[अथ विरहं वर्णयन् व्याकुलः कविः तयोर्मिथो- मिलनकाल-स्मरणजातहर्षः आशिषा सर्गमुपसंहरति] राधामुग्ध- मुखारविन्दमधुपः (राधायाः मुग्धं सुन्दरं यत् मुखारविन्दं वदनकमलं तस्य मधुपः भ्रमरः) त्रैलोक्य-मौलि-स्थली- नेपथ्योचित-नीलरत्नं (त्रैलोक्यस्य त्रिभुवनस्य या मौलिस्थली शिरोभागः श्रीवृन्दावन-भूमिरित्यर्थः तस्या नेपथ्योचितम् अलङ्कारभूतं नीलरत्नम्) अवनीभारावतारक्षमः (अवन्याः क्षितेः भारस्य अवतारे दुर्वृत्तदमनादिना हरणे क्षमः समर्थः), [तथा] व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष-प्रदोषः (व्रजसुन्दरीजनानां मनसां तोषाय प्रदोषः रजनीमुखस्वरूपः) [तथा] कंस-ध्वंसन-धूमकेतुः (कंसस्य ध्वंसने धूमकेतुः) देवकीनन्दनः त्वां चिरम् अवतु (रक्षतु) ॥ [अतएव श्रीराधाया गमनकाङ्क्षया सहितः पुण्डरीको यत्र इति सर्गोऽयं पञ्चमः] ॥५॥ अनुवाद—जो श्रीराधाजीके मनोहर मुखारविन्दका मधुपान करनेमें मधुपस्वरूप हैं, जो त्रिभुवनके मुकुटमणि-सदृश वृन्दावनधामके इन्द्रनीलमणिमय विभूषण सदृश हैं, जो अनायास प्रदोषकी भाँति ब्रजसुन्दरियोंका सन्तोष विधान करनेमें समर्थ हैं, जो पृथ्वीके भाररूपी दैत्यदानवोंका संहार करते हैं—ऐसे कंस-विध्वंसके धूमकेतु स्वरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें। बालबोधिनी—श्रीराधा और श्रीकृष्णके विरह वर्णन करनेके पश्चात् कवि दोनोंके मिलनके संभोग पक्षीय शृंगार-रसका चित्रण करते हुए पाठकों तथा श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं कि— मुग्धमुखारविन्दमधुप—श्रीराधाका मुख कमलवत् है। जिस

पञ्चमः सर्गः-साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०७ प्रकार भ्रमर कमलका सेवन करते हुए उसके पराग मधुका पान करता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुख-कमल- माधुर्यका आस्वादन करते हैं। इसलिए वे 'मुग्धमधुप' पदसे संबोधित हुए हैं। प्रस्तुत श्लोकांशसे संयोग व्यक्त हुआ है। त्रैलोक्यमौलिस्थलीनेपथ्योचितनीलरत्नः-त्रिभुवनमें किरीट स्थानीय अर्थात् सर्वोत्कृष्ट स्थानोंको विभूषित करनेवाले वे नील-रत्न हैं। नेपथ्योचितका अर्थ है 'भूषणोचित'। अवनीभारावन्तारान्तक-शिशुपाल, दन्तवक्र तथा कंस आदि पृथ्वीका भार बढ़ानेके लिए उत्पन्न हुए थे, इन्हीं 'राक्षसों' का विनाश करनेके लिए श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे। अन्तकका अर्थ है 'यम'। श्रीकृष्ण अवनीभारावन्तारोंके लिए यमके समान है। स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीजनमनस्तोषप्रदोषोदयः-श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके मनोंको तोषप्रदानकारी सायंकालवत् हैं। सायंकाल होनेपर जैसे द्विजराज चन्द्रमा उदित होता है तथा कामिनियोंको अपने प्रेमियोंसे मिलनेका अवसर करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके हृदयोंको स्वच्छन्दतापूर्वक आनन्द प्रदानकर उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हैं। कंसध्वसनधूमकेतुः-कंस नामक असुरके विनाशकारी श्रीकृष्ण धूमकेतु तारेके समान हैं। धूमकेतु एक तारा विशेष है। मान्यता है कि जब यह उदित होता है, तब राजाका विनाश अवश्यम्भावी होता है। श्रीकृष्णका अवतार कंसके विनाशका सूचक है। धूमकेतुका अन्य अर्थ है-भानुके समान प्रकाशक। श्रीराधाके कामको शान्त करनेवाले श्रीकृष्ण धूमकेतु हैं। प्रदोष अर्थात् प्रगतो दोषादयः। प्रस्तुत श्लोकमें श्लेष, लुप्तोपमा, परिकर तथा वर्णोपमा

२०८ श्रीगीतगोविन्दम् नामक अलंकारोंका समावेश है। शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा पाञ्चाली रीति है। इस प्रकार श्रीजयदेव प्रणीत गीतगोविन्द काव्यके अभिसारिका वर्णनमें 'साकांक्षपुण्डरीकाक्ष' नामक पाँचवाँ सर्ग पूर्ण हुआ। श्रीराधाके आगमनकी प्रतीक्षामें पुण्डरीकाक्ष विराजमान हैं—ऐसा यह पाँचवाँ सर्ग सबके प्रति आनन्ददायी हो। इति गीतिगोविन्द महाकाव्ये एकादश सन्दर्भे टीकायां बालबोधिनी वृत्ति।