गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः-साकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०७ प्रकार भ्रमर कमलका सेवन करते हुए उसके पराग मधुका पान करता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण श्रीराधाके मुख-कमल- माधुर्यका आस्वादन करते हैं। इसलिए वे 'मुग्धमधुप' पदसे संबोधित हुए हैं। प्रस्तुत श्लोकांशसे संयोग व्यक्त हुआ है। त्रैलोक्यमौलिस्थलीनेपथ्योचितनीलरत्नः-त्रिभुवनमें किरीट स्थानीय अर्थात् सर्वोत्कृष्ट स्थानोंको विभूषित करनेवाले वे नील-रत्न हैं। नेपथ्योचितका अर्थ है 'भूषणोचित'। अवनीभारावन्तारान्तक-शिशुपाल, दन्तवक्र तथा कंस आदि पृथ्वीका भार बढ़ानेके लिए उत्पन्न हुए थे, इन्हीं 'राक्षसों' का विनाश करनेके लिए श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे। अन्तकका अर्थ है 'यम'। श्रीकृष्ण अवनीभारावन्तारोंके लिए यमके समान है। स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीजनमनस्तोषप्रदोषोदयः-श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके मनोंको तोषप्रदानकारी सायंकालवत् हैं। सायंकाल होनेपर जैसे द्विजराज चन्द्रमा उदित होता है तथा कामिनियोंको अपने प्रेमियोंसे मिलनेका अवसर करता है, वैसे ही श्रीकृष्ण व्रजसुन्दरियोंके हृदयोंको स्वच्छन्दतापूर्वक आनन्द प्रदानकर उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हैं। कंसध्वसनधूमकेतुः-कंस नामक असुरके विनाशकारी श्रीकृष्ण धूमकेतु तारेके समान हैं। धूमकेतु एक तारा विशेष है। मान्यता है कि जब यह उदित होता है, तब राजाका विनाश अवश्यम्भावी होता है। श्रीकृष्णका अवतार कंसके विनाशका सूचक है। धूमकेतुका अन्य अर्थ है-भानुके समान प्रकाशक। श्रीराधाके कामको शान्त करनेवाले श्रीकृष्ण धूमकेतु हैं। प्रदोष अर्थात् प्रगतो दोषादयः। प्रस्तुत श्लोकमें श्लेष, लुप्तोपमा, परिकर तथा वर्णोपमा