भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 448 में से

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२०६ श्रीगीतगोविन्दम् इति श्रीगीतगोविन्दे अष्टमः सन्दर्भः इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्येऽभिसारिका वर्णने साकाङ्क्षो नाम पञ्चमः सर्गः। अन्वय—[अथ विरहं वर्णयन् व्याकुलः कविः तयोर्मिथो- मिलनकाल-स्मरणजातहर्षः आशिषा सर्गमुपसंहरति] राधामुग्ध- मुखारविन्दमधुपः (राधायाः मुग्धं सुन्दरं यत् मुखारविन्दं वदनकमलं तस्य मधुपः भ्रमरः) त्रैलोक्य-मौलि-स्थली- नेपथ्योचित-नीलरत्नं (त्रैलोक्यस्य त्रिभुवनस्य या मौलिस्थली शिरोभागः श्रीवृन्दावन-भूमिरित्यर्थः तस्या नेपथ्योचितम् अलङ्कारभूतं नीलरत्नम्) अवनीभारावतारक्षमः (अवन्याः क्षितेः भारस्य अवतारे दुर्वृत्तदमनादिना हरणे क्षमः समर्थः), [तथा] व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष-प्रदोषः (व्रजसुन्दरीजनानां मनसां तोषाय प्रदोषः रजनीमुखस्वरूपः) [तथा] कंस-ध्वंसन-धूमकेतुः (कंसस्य ध्वंसने धूमकेतुः) देवकीनन्दनः त्वां चिरम् अवतु (रक्षतु) ॥ [अतएव श्रीराधाया गमनकाङ्क्षया सहितः पुण्डरीको यत्र इति सर्गोऽयं पञ्चमः] ॥५॥ अनुवाद—जो श्रीराधाजीके मनोहर मुखारविन्दका मधुपान करनेमें मधुपस्वरूप हैं, जो त्रिभुवनके मुकुटमणि-सदृश वृन्दावनधामके इन्द्रनीलमणिमय विभूषण सदृश हैं, जो अनायास प्रदोषकी भाँति ब्रजसुन्दरियोंका सन्तोष विधान करनेमें समर्थ हैं, जो पृथ्वीके भाररूपी दैत्यदानवोंका संहार करते हैं—ऐसे कंस-विध्वंसके धूमकेतु स्वरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें। बालबोधिनी—श्रीराधा और श्रीकृष्णके विरह वर्णन करनेके पश्चात् कवि दोनोंके मिलनके संभोग पक्षीय शृंगार-रसका चित्रण करते हुए पाठकों तथा श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं कि— मुग्धमुखारविन्दमधुप—श्रीराधाका मुख कमलवत् है। जिस

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