गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः - आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०५ अनुवाद-हे शोभने! तिमिरमय पथपर भय और चकित दृष्टिसे देखती हुई, तरुवरोंके समीप खड़ी होकर पुनः शनैः-शनैः पग बढ़ाती हुई, किसी प्रकार एकान्तमें पहुँची हुई, कामकी तरंगोंसे कल्लोलित होती हुई तुम्हें देखकर सौभाग्यवान श्रीकृष्ण कृतकृत्य होंगे। बालबोधिनी-तुम्हारी प्राप्ति ही श्रीकृष्णका सर्वस्व है, इसका दिग्दर्शन करते हुए सखी श्रीराधासे कह रही है-हे अतिशय सुन्दरि ! जब तुम यहाँसे चलने लगोगी, तब तुम्हारा मार्ग अन्धकारसे परिपूर्ण होगा। उस अन्धेरे पथपर चलते हुए भयभीत होकर चकित-सी तुम आगे पैर बढ़ाओगी। अन्धकारमें भयका होना तो स्वाभाविक ही है, कहीं कोई देख न ले, अतः चकित होना भी सहज ही है। ऐसे निविड़ अन्धकारमें मैं श्रीकृष्णसे मिलनेके संकेत-स्थानपर जा रही हूँ-ऐसा विस्मय तो होगा ही, जाने पर श्रीकृष्णसे मिलन होगा या नहीं-यह शंका भी होगी। स्तन एवं नितम्ब भारसे तुम्हारा शरीर शीघ्र ही अतिशय क्लान्त हो जाता है, अतः शीघ्र जानेमें असमर्थ अलसायी-सी तुम प्रत्येक वृक्षके नीचे ठहर-ठहर कर चलना। अनङ्गकी लहरें तुम्हारे शरीर पर क्रीड़ा कर रही हैं, इस शिथिलतासे उपलक्षित संकेत स्थानपर तुम्हें देखकर शुभग श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो जाएँगे। वे प्रसन्नताके अतिशय आवेगमें अवगाहन करने लगेंगे। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द तथा अतिशयोक्ति नामक अलंकार है। राधा-मुग्ध-मुखारविन्द-मधुपस्त्रैलोक्य-मौलि-स्थली नेपथ्योचित-नील-रत्नमवनी-भारावतारान्तकः । स्वच्छन्दं व्रज-सुन्दरी-जन-मनस्तोष प्रदोषोदयः कंस-ध्वंसन-धूमकेतुरवतु त्वां देवकी-नन्दनः ॥५ ॥