गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः- आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०३ रस है, जिसे प्राप्त करना अवशिष्ट रह जाय। उस व्रीड़ा-मिश्रित रसमें सब प्रकारके रसोंका समागम हो जाता है। भ्रमात् से तात्पर्य है—कुंजकी ओर भ्रमण करते हुए परस्पर मिल गये हों, अन्धकारमें परस्पर वार्तालापसे पहचान लिये गये हों अथवा अन्य किसी प्रयोजनसे गये हों और मिल गये हों। वार्तालाप होनेसे सात्विक भावके द्वारा स्वर-भंगसे पहचान लिये गये हों। मिलनके साथ ही वे सहसा आलिंगन करते हैं, किन्तु दोनोंको भय रहता है कि कहीं किसीने देख न लिया हो। अतः 'भयानक रस' प्रादुर्भूत होता है, जिसका 'भय' स्थायी भाव है। कान्ताके बार-बार मना किये जाने पर भी नायक अपनी हठवृत्तिके कारण उसका चुम्बन करता है, दन्तक्षत करता है। पर पुनः उसे शोक होता है—मैंने व्यर्थ ही इसे कष्ट पहुँचाया, लाख मना करने पर भी माना नहीं। अतः करुणासे उनका अन्तःकरण विगलित होता है। अतः यहाँ 'करुण रस' प्राप्त होता है। कामको प्रोत्साहित करनेके लिए परस्पर नखोल्लेख करते हैं, जिसका स्थायी भाव है 'उत्साह'। तत्पश्चात् परस्पर दोनों एक दूसरेके साथ रतिक्रीड़ाके लिए तत्पर होते हैं। इस क्रीड़ामें उन्हें विस्मय-प्रधान अद्भुत रसकी सुखानुभूति होती है। तत्पश्चात् कामोद्बोध होने पर नाना विलासोंसे विलसित हो परस्पर हास्य प्रधान बातें करते हैं और तब रतिक्रीड़ामें लिप्त होने पर दोनोंको हास्य रस अनुभूत होता है। सुरत-क्रीड़ा सम्पन्न होनेपर जब वे परस्पर आनन्दका अनुभव करते हैं, तब उन्हें सकल-रस-चक्रवर्ती रसराज शृङ्गार रसकी मधुरानुभूति होती है। इस प्रकार तिमिरमें मिलित पहले अनजान, फिर परस्पर पहचान लिये जानेपर दोनोंको लज्जा होती है, परन्तु परस्पर दोषारोपण अथवा क्रोध नहीं करते, क्योंकि दोनोंका समान दोष होता