गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ श्रीगीतगोविन्दम् विन्दतोः) दम्पत्योः (स्त्रीपुंसयोः) [यथाक्रमं] आश्लेषात् (आलिङ्गनात्) अनु (पश्चात्), चुम्बनात् अनु, नखोल्लेखात् (नखानाम् उल्लेखात् आघातात्) अनु, स्वान्तजप्रोद्बोधात् (स्वान्तजस्य कामस्य प्रोद्बोधात् प्रकाशनात्), अनु, सम्भ्रमात् (साध्वसात्) अनु, रतारम्भात् (शृङ्गारारम्भणात्) अनु, प्रीतयोः (परितोषं गतयोः) कः कः व्रीड़ाविमिश्रः (व्रीड़या, कथं सहसैवं कर्त्तुमारब्धमित्येवं लज्जया विमिश्रः संवलितः) रसः (सम्भोगाद्यास्वादः) न [भवति] न [अपितु सर्वत्रैव सलज्जः रसास्वादः भवत्येव इत्यर्थः]। [एतेन अभिसर्त्तुं श्रीराधिका- प्रोत्साहनमुक्तम्] ॥३॥ अनुवाद—इस निविड़ तिमिरमें नायक-नायिका एक-दूसरेको प्राप्त करने हेतु अन्वेषणके लिए भ्रमण करते हुए अन्य नायक तथा नायिकाके भ्रमसे मिले हुए सम्भाषण द्वारा एक दूसरेको पहचान लेने पर परस्पर आलिङ्गन, पश्चात् चुम्बन, उसके बाद नख-क्षत अर्पण, पश्चात् कामोद्रेक होने पर मदनके आवेशमें सम्भ्रमके साथ रतिकेलिका प्रारम्भ होने पर सुरतक्रीड़ाके पश्चात् दोनों एक चमत्कारपूर्ण प्रीतिका अनुभव करोगे। इस अन्धकारमें व्रीड़ामिश्रित कौन-सा रस प्राप्त नहीं होगा? अतएव हे सुन्दरि ! चलो, शीघ्रातिशीघ्र केलि-कुंजमें चलें, भला ऐसे सुअवसरका क्या कभी त्याग किया जाता है? बालबोधिनी—सखी श्रीराधाको प्रलोभन दे रही है कि हे सखी राधिके ! वहाँ श्रीकृष्णके समीप पहुँचने पर तुम्हें अनेक प्रकारका केलि-कौतुक प्राप्त होगा—इस कथनसे सखी श्रीराधाकी उत्कण्ठा बढ़ाकर उन दोनोंके मनोरथका अभिव्यञ्जन कर रही है। अन्धकार हो जाने पर नायक अन्य नायिकाको तथा नायिका अन्य नायकको प्राप्त करनेके लिए यदि निकले हों और जब वे परस्पर मिलित हो जाएँ, तब जिस व्रीड़ा मिश्रित शृङ्गार रसकी अनुभूति होती है। तब ऐसा कौन-सा