भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

पञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः २०१ व्यर्थ हो गयी। मैं अति दीर्घकालसे करुण प्रार्थना कर रही हूँ। अब विलम्ब करना व्यर्थ है। अभिसारकी रमणीय बेला उपस्थित है। बालबोधिनी—हे राधे, हे मुग्धे! यह प्रियतमके समीप जानेका उपयुक्त समय है। अपने वाम स्वभावके अधीन होकर तुम मान करके बैठी ही रहीं, अब तो मान समाप्त हो गया है और इधर सूर्य भी अस्त हो गया। तुम्हारे रति-अभिसरणमें अब कोई बाधा नहीं है। गोविन्दके मनमें तुम्हारे प्यारके जो मनोरथ उठे थे, उनके साथ-साथ अन्धकार भी और गहरा हो उठा, मिलनकी आशा और तीव्र हो उठी। रात्रिकालमें चकवा-चकवी दोनों एक-दूसरेसे अलग-अलग होकर विरहाधिक्यके कारण दीर्घ करुण क्रन्दन करने लगते हैं। उसी दीर्घ पुकारके समान तुम्हारे समक्ष श्रीकृष्ण-मिलनके लिए की गयी मेरी अभ्यर्थना व्यर्थ ही चली गयी। हे मुग्धे, अब समय व्यर्थ मत गँवाओ, अभिसारका विशेष समय होता है, घना अन्धकार है, प्रियतम तुम्हारे लिए उत्कण्ठित हैं, तुम वेश-भूषादिके बहाने आगमनमें अब विलम्ब मत करो, जल्दी करो। प्रस्तुत श्लोकमें सहोक्ति अलंकार है तथा शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है। आश्लेषादनु चुम्बनादनु नखोल्लेखादनु स्वान्तज- प्रोद्बोधादनु सम्भ्रमादनु रतारम्भादनु प्रीतयोः। अन्यार्थं गतयोर्भ्रमान्मिलितयोः सम्भाषणैर्जानतो- र्दम्पत्योरिह को न को न तमसि व्रीड़ाविमिश्रो रसः ॥३॥ अन्वय—[अथ उत्कण्ठावर्द्धनाय सुरतप्रीतेरत्याधिक्यं दर्शयति] —अन्यार्थं (अन्योन्यसङ्गलाभाय कार्यान्तरमुपलक्ष्य) गतयोः (सङ्केतस्थानं प्राप्तयोः) भ्रमात् (अन्वेषणाय भ्रमणात्) इह (ईदृशे सान्द्रे) तमसि (गाढ़ान्धकारे) मिलितयोः (सङ्गतयोः) सम्भाषणैः (कण्ठध्वनिभिः) जानतोः (केयं कश्चायमिति

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक) · पृष्ठ 233, कुल 448 में से · BharatKosha